हिंदी अनाचार के खिलाफ विद्रोह की भाषा हो सकती थी, पर इसे झूठे गर्व के साथ जोड़ा जा रहा है

आधुनिक हिंदी का विकास कॉलोनियल राज के दौरान हुआ है और इस प्रकार यह भाषा संघर्ष और आजादी की भाषा है. गांधी ने आजादी के आंदोलन के दौरान हिंदी को एकता के सूत्र के तौर पर देखने की कोशिश की थी, इस प्रकार यह भाषा सबको समेटने और सारी विभिन्नताओं को अवशोषित करने की भाषा है. यह भारत में बोली जाने वाली सबसे नई भाषाओं में से एक है, इस प्रकार यह पुरातनपंथ के किसी भी कुंठित नजरिए से मुक्त रहने की भाषा है. पर वास्तविकता में हिंदी के साथ क्या हो रहा है? एक भाषा को अपनी कुंठाओं के प्रदर्शन का जरिया बना दिया गया है. पहाड़ से निकली नदी पर इतिहास की विकृतियों के बांध बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं. जो भाषा विद्रोह की होनी चाहिए थी, वह झूठे गर्व का प्रतीक बनाई जा रही है.

हिंदी दिवस आते ही विक्टोरियन साम्राज्य के नाटकों की तरह अतिरेक भरी चीख पुकार मचने लगती है. साउंड एंड फ्यूरी. टुमॉरो एंड टुमॉरो एंड टुमॉरो. हाय हिंदी, हम ना हुए. हा हिंदी, मैं प्राणहंता. हिंदी वा कुंजरो. बुजरो. किसी बी ग्रेड के नाटक की तरह अतिशयोक्ति भरी बातें क्यों सुनने को मिलती हैं? हिंदी मेरी मां है. मैं इसकी पूजा करता हूं. मुझे इस पर गर्व है. हिंदी की सेवा करनी है मुझे. हिंदी का प्रचार-प्रसार करना है मुझे. आखिर इन बातों का मतलब क्या है? क्या हिंदू धर्म के प्रचार करने का मौका नहीं मिला तो यह नया रास्ता बनाया गया है? तलवार के दम पर हिंदी का प्रचार करेंगे? यहां तलवार से तात्पर्य इन अतिशयोक्तिपूर्ण वाक्यों से हैं जो एक सामान्य मनुष्य को उसी तरह काटने दौड़ते हैं.

क्या आप यह महसूस कर पाते हैं कि मोटेराम शास्त्री चाहे जितने कुकर्म कर लें, उनके लिए ‘उनके’ शब्द का ही प्रयोग होता है? गोबर चाहे जितना क्रांतिकारी बन ले, उसके लिए ‘उसके’ शब्द का ही प्रयोग होता है? क्या आपको यह समझ नहीं आता कि एक नई भाषा हिंदी में भी जातिवाद को कायम रखने के लिए तरीके गढ़ लिये गये. प्यूरिटी एंड पॉल्यूशन- हिंदी से ज्यादा कौन समझता है इसे? यह एक वजह है कि हिंदी में नये शब्दों का प्रयोग लगभग वर्जित ही है. अंग्रेजी के शब्द अगर वाक्यों में घुस जाएं तो लोग दुखी होने लगते हैं. किसी जॉम्बी की तरह रटने लगेंगे कि हिंदी को बर्बाद किया जा रहा है. भारत की तमाम भाषाओं उर्दू, तमिल, मलयालम, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, तेलुगु, उड़िया इत्यादि से हिंदी अलग रहना चाहती है या हिंदीवाले चाहते हैं कि हिंदी अलग रहे. ताकि बाकी भाषाएं बोलनेवालों पर भार डाला जा सके कि तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं है. क्योंकि यह एक अकेली सत्तापोषित भाषा है जिसे सम्राट अशोक के धम्म की तरह फैलाया जा रहा है. स्वयंचेष्टा से लोग इसे नहीं अपनाएंगे बल्कि डर के मारे अपनाएंगे क्योंकि नौकरी चली जाएगी या फिर नौकरी मिल जाएगी.

यह वजह है कि हिंदी साहित्य में कुछ लेखकों और रचनाओं को छोड़ दें तो नब्बे के बॉलीवुड की तरह की रचनाएं ही आती हैं जो स्टेटस कुओ मेनटेन रखने में मदद करती हैं. यह कहने का तात्पर्य ये बिल्कुल नहीं है कि हिंदीभाषी लोग वैसी रचनाएं नहीं कर सकते जो अन्य भाषाओं में हो सकती हैं. हिंदीभाषी भी उतने ही प्रतिभाशाली हैं जितने कि बाकी अन्य लोग. कहने का तात्पर्य यह है कि उन रचनाओं को वह जगह नहीं मिलती जो अन्य भाषाओं में मिलती है. इस वजह से ज्यादातर लेखक एक विशेष प्रकार के रचनाकर्म में लग जाते हैं जो शायद ही किसी प्रचलित मान्यता को तोड़ने का प्रयास करता है.

उदाहरण के तौर पर आज के जमाने की बात ‘होमोसेक्सुअलिटी’ को हिंदी में रचनाओं में देखने का प्रयास करते हैं. पांडेय बेचन शर्मा उग्र ने सौ साल पहले होमोसेक्सुअलिटी को अपनी कई रचनाओं का आधार बनाया जिनमें ‘चॉकलेट’ सबसे ज्यादा इनफेमस है. इस रचना को तत्कालीन लोगों ने खारिज किया. बाद में राजकमल चौधरी ने ‘मछली मरी हुई’ में होमोसेक्सुअलिटी को रेखांकित किया पर राजकमल को लोगों ने भुला दिया. इन लेखकों की रचनायें वैसी ही रहीं जैसी मंटो या फिर इस्मत चुगतई की होमोसेक्सुअलिटी पर लिखी रचनायें थीं, पर इनके जितनी प्रसिद्ध नहीं हो पाईं. कहने का मतलब यह है कि लिखनेवालों की धार में कमी नहीं थी, उसको स्वीकार करनेवालों की धार में कमी है. आज भी होमोसेक्सुअलिटी हिंदी साहित्य में न के बराबर है और आज भी उसे लिखनेवाले को ‘सस्ती लोकप्रियता’ का ग्राही बताया जाएगा.

हिंदी में हम कितनी रचनाएं पाते हैं जो सांप्रदायिकता को समझने का प्रयास करती हैं? भीष्म साहनी की ‘तमस’, विभूति नारायण राय की ‘शहर में कर्फ्यू’, कमलेश्वर की ‘कितने पाकिस्तान’ के अलावा कितने और लेखक हैं जिन्होंने सांप्रदायिकता पर ऐसा लिखा हो कि पढ़नेवाले परेशान हो जाएं? उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह है कि क्या पाठकवर्ग इन रचनाओं को पढ़ने योग्य समझता है, क्या वह इन पर चर्चा करता है? कश्मीर की समस्या पर हिंदी में कितने उपन्यास, कविताएं, निबंध इत्यादि लिखे गये हैं? क्या कश्मीर में प्लॉट खरीदने को उत्सुक पाठकवर्ग पढ़ना चाहता है? ऐसे ही तमाम और भी विषय हैं जिनको लेकर हिंदी के लेखक और पाठक बचते रहते हैं. हां, ये बात जरूर ध्यान में रहे कि लुग्दी साहित्य के लेखकों ने कश्मीर पर लिखा है और कश्मीर समस्या का समाधान भी उसी तरीके से बताया है जैसा फिल्मों में होता है.

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है. हिंदी की जड़ता और कृत्रिमता पर सवाल उठाते ही नाग की तरह फुंफकारते लोग प्रकट हो जाते हैं. वह आपसे प्रश्न करने लगेंगे कि मेरी हिंदी को ऐसा कहने की हिम्मत तुम्हारी कैसे हुई? हिंदी से ही हम खाते-पीते हैं, तुम ऐसा कैसे कह सकते हो? तुम्हें अंदाजा नहीं है कि कखगघ ने ऐसी ऐसी किताबें लिखी थीं कि विश्व साहित्य में वैसी किताबें नहीं मिलेंगी. इत्यादि. इत्यादि. ऐसे कृत्रिम क्रोध वाले लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देते.

आज जब हिंदी हार्टलैंड की मानसिकता ने समूचे देश पर अधिकार कर लिया है तो मानव जाति के कल्याण हेतु इसे समझने की आवश्यकता है. ऐसी स्थिति में हिंदी में वैसी रचनाएं आनी चाहिए जो ‘अखिल भारतीय स्तर’ की समस्याओं के खिलाफ विद्रोह का स्वर बनें. कन्नड़ भाषा के लेखक अरविंद अडिगा अंग्रेजी में बिहार की जाति प्रथा पर उपन्यास लिखकर बुकर प्राइज जीतते हैं और बिहार में उस पर उपन्यास है ही नहीं. जो हैं वो यथास्थितिवादी हैं.

इन बातों का यह अर्थ कदापि ना लगाया जाए कि गुलशेर खां शानी, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, काशीनाथ सिंह, राही मासूम रजा इत्यादि की रचनाओं को दरकिनार कर हिंदी साहित्य को छोटा बनाने की कोशिश हो रही है. इन बातों का अर्थ यह है कि हिंदी साहित्य को अपनी सीमाओं में ना बंधकर मानव मस्तिष्क के विस्फोट की तरफ देखना चाहिए. यथास्थितिवादी ना बनकर या अवसाद-अकेलापन में ही ना फंसकर नये विषयों को तलाशना चाहिए. जब नये विषयों को तलाशेंगे तब आसानी से अन्य भाषाओं के लोगों को भी अपने साथ जोड़ लेंगे.

दोस्तोवस्की, टॉल्सटॉय, इतालो कैल्विनो, मार्केज से लेकर आज के नये विदेशी लेखकों की किताबें क्यों दुनिया भर के लोग पढ़ते हैं? क्योंकि उनमें वो भाव होते हैं जो हर इंसान को छू जाते हैं. हिंदी साहित्य भी जब तक उन भावों को छूने का प्रयास नहीं करेगा, तब तक हिंदी दिवस मनाने में व्यस्त रहेगा. कल्पना करें कि दोस्तोवस्की रशियन को अपनी मां बताते तो क्या क्राइम एंड पनिशमेंट लिख पाते. हिंदी की सेवा के नाम पर अपने मस्तिष्क पर प्रतिबंध ना लगाकर उसे उन्मुक्त छोड़ना ही सबसे बढ़िया कार्य रहेगा. इसके लिए हिंदी के बेटों की उपेक्षा करनी होगी वरना वह सस्ती लोकप्रियता और महंगी लोकप्रियता में साहित्य का विभाजन करते रहेंगे.

रियल लाइफ का आपका दोस्त सोशल मीडिया पर आपसे नफरत क्यों करने लगता है?

बचपन में कई बार ऐसा होता था कि हम क्रिकेट मैच या खिलाड़ियों को लेकर बहस करने लगते थे कि कौन सा मैच सबसे अच्छा था या कौन सा खिलाड़ी सबसे जबर्दस्त खेलता है. कभी कभी ये बहस बहुत गरमा-गरमी की भी हो जाती थी और इसमें बहुत सारे लोग कुतर्कों पर उतर आते थे. पर बहुधा ऐसा होता कि उसी ग्रुप में से कोई इस गरमा-गरमी से परेशान होकर सभा भंग कर देता. या फिर किसी के पिताजी नजर आ जाते और सबको भागना पड़ता था. फिर हम लोग अन्य कामों में व्यस्त हो जाते जैसे कि किताब पढ़ना, खेलना या बाजार जाना या फिर भाई-बहनों के साथ किसी और चीज पर बात करना. ये बात भी बहुत बढ़ जाती थी तो पिता या माता कह देते थे कि चलो बहुत हुआ, अब कपड़े धो लो या खाना खा लो. तमाम बहसों के बाद भी किसी से नफरत नहीं होती थी. नफरत होने के पीछे बड़ा कारण होना होता था. हां, आप अपने हिसाब से किसी को जज भी करते थे और पता था कि यह व्यक्ति इतने गुण-दोषों से भरा हुआ है. उसका आनंद भी लेते थे. इस पूरे प्रोसेस में एक रेगुलेटरी बॉडी थी कि अब इससे ज्यादा बहस नहीं करनी है और हो भी गई तो एक मेल-मिलाप की संभावना बनी रहेगी.

सोशल मीडिया पर वो रेगुलेटरी बॉडी खत्म हो गई है. इसके साथ ही एक और चीज हुई है. आपका दोस्त आपको रियल लाइफ में पसंद करेगा, मिलेगा और हंसी मजाक करेगा. पर सोशल मीडिया पर वो आपको अलग तरीके से देखता है. फर्ज कीजिए कि आपने एक स्टेटस लिखा. हालांकि वो स्टेटस आपके पूर्ण ज्ञान और आपकी मानवता को पूरी तरह से नहीं बताता, पर वो लिखना अपने आप में मुकम्मल डॉक्यूमेंट बन जाता है क्योंकि वो लिखा हुआ है और बहुत देर तक विजिबल रहेगा. बोली हुई चीजें तो उड़ जाती हैं. बात करते हुए आपको ख्याल आ सकता है कि आपका दोस्त फेंक रहा है, झूठ बोल रहा है या इसको पता नहीं है. पर आप इग्नोर करते रहते हो. ये भी हो सकता है कि आपको खुद ही ना पता हो. दोनों ही स्थितियों में आप दोस्ती को ऊपर रखने की कोशिश करते हो. अगर बहस हो भी गई तो आप उसे चाय या आईसक्रीम पर सुलझाने की कोशिश करते हैं. पर सोशल मीडिया पर लिखना ब्रह्मवाक्य बन जाता है.

उसके नीचे जो कमेंट आते हैं वो अपने हिसाब से आपके स्टेटस और आपको जज करते हैं. पर उनमें एक बात होती है. हर कमेंट में थोड़ी थोड़ी ऐसी चीजें होती हैं जो पढ़नेवाले के सबकॉन्शस में आपकी एक इमेज बनाती है. पढ़ने वाले को लगेगा कि उसने आपका ये रूप तो देखा ही नहीं है, ना ही कभी सोचा है. वो खुद को ठगा हुआ महसूस करता है और आपके प्रति उसके मन में भयानक क्रोध फैल जाता है. ये सारी बातें काल्पनिक आधार पर जजमेंट के द्वारा हो रही हैं. जिस दोस्त को आप उसके व्यक्तिगत गुणों की वजह से पसंद करते हैं और दोषों पर हंसते हैं, उसके नये गुण-दोष आपको नजर आएंगे और वो व्यक्ति ही बिल्कुल नया लगने लगेगा. वहीं कमेंट में आप पर जजमेंट पास करते व्यक्ति आपके दोस्त को समझदार या रोचक नजर आएंगे.

यहां पर एक मनोवैज्ञानिक घटना होती है. आपके दोस्त के मन में आपके लिए नई भावना का निर्माण होता है और जो पुराने संबंध हैं, उन पर प्रश्न चिह्न लग जाता है. क्योंकि यहां पर कोई रेगुलेटरी बॉडी नहीं है जो ये कहे कि चलो बहस खत्म हुई, अब अपना काम करो. बहुत बार बिना गरमा-गरमी के भी आपका दोस्त आपकी नई इमेज बना लेगा.

ठीक यही काम आप भी करते हैं. अपने दोस्त की लाइकिंग-डिस्लाइकिंग को आप सोशल मीडिया के हवाले से जज करते हैं और उसका एक नया रूप देखते हैं. ये मन में बिटरनेस भर देता है.

सच्चाई क्या है? सच तो यह है कि ये सारे वार्तालाप, विचार सब कुछ ना सिर्फ टेम्पररी हैं बल्कि इनका कोई आधार भी नहीं है. यह ठीक वैसा ही है कि हम लगातार किसी व्यक्ति की बातें सुन रहे हैं. अगर आप दिन भर किसी व्यक्ति को हर मुद्दे पर बोलता सुनें तो उससे ऐसे ही नफरत हो जाएगी. साथ ही आपको दिन भर यह भी पता चलता रहे कि इतने सारे लोग, आपके जाननेवाले लोग भी, आपके बारे में लगातार नेगेटिव बातें बोल रहे हैं तो दिमाग ब्लास्ट कर जाएगा. ऐसा भी होता है कि लोग पॉजिटिव भी बोलते हैं, पर वो भी उतना ही नकली होता है. क्योंकि उनके शब्दों का चयन अलग हो सकता है और आपका इंटरप्रीटेशन बिल्कुल अलग हो सकता है. साथ ही यह डर भी हो जाता है कि क्या पता अगला झूठ बोल रहा हो. जबकि आमने-सामने के इंटरएक्शन में शायद ही ऐसी कोई बात हो. आखिर अपनी निजी जिंदगी में हम रोज कितने लोगों से गरमा-गरमी करते हैं, बहस करते हैं?

सोशल मीडिया पर ऐसा लगता है जैसे हर कोई रोड रेज का शिकार है. यह हमारे सबसे हिंसक रूप को सामने लाता है जिसमें हम मानसिक हिंसा कर रहे होते हैं. जिस बात के लिए हम चाहते हैं कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर रोये, गिड़गिड़ाये, माफी मांगे, वास्तविक जीवन में उससे मिलने पर हम शायद ही यह चाहेंगे. अगर वो हंसमुख है तो उसके साथ बैठकर हंसेंगे ही.

एक आम इंसान जो स्मार्टफोन और इंटरनेट से दूर है, वह अपने जीवन में कुछ फिक्स लोगों से नफरत करता है. उसके पीछे वजह होती है- जमीन का झगड़ा, पैसे का झगड़ा, धोखा या फिर ऐसी ही कोई और बात. उसके आस पास के लोगों को पता होता है कि यह व्यक्ति फलाने-ढिमका को पसंद नहीं करता और इसके चार-पांच अच्छे दोस्त हैं जिनको पसंद करता है. पर सोशल मीडिया पर ऐसा नहीं है. आपको नहीं पता कि आप किससे किससे नफरत करते हैं. आपने किसी का पोस्ट देखा, उससे नफरत करने लगे. किसी का कमेंट देखा, उससे नफरत करने लगे. यह एक ऐसे गुस्से से भर देता है जिसका कोई आधार नहीं है. ऐसा लगता है जैसे हम मानसिक बीमार हो गये हों और आसानी से हमारे क्रोध को भड़काया जा सकता है. जो व्यक्ति सोशल मीडिया पर हमें गाली दे रहा है, वह मिलने पर सिर्फ अच्छे से बात करेगा. इसकी 99% गारंटी है. कोई आपराधिक तत्व ही मिलते ही झगड़ा कर लेगा. पर सोशल मीडिया पर अकारण ही कोई भी झगड़ा कर सकता है.

जैसे हम अक्सर देखते हैं कि भारत-पाकिस्तान या भारत-चीन के बीच युद्ध को लेकर लोग उत्तेजित हो जाते हैं. सोशल मीडिया पर देखकर लगेगा जैसे हजारों-लाखों युवा युद्ध में जाने के लिए बेकरार हैं. पर सच्चाई यह होगी कि उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो ओवरवेट होंगे, बीयर पीते हुए पोस्ट लिख रहे होंगे, जो तीसरे फ्लोर पर फ्लैट में रहते हैं और लॉकडाउन में एक बार भी नीचे नहीं उतरे होंगे. घरों में कपड़े गंदे पड़े सड़ांध मार रहे होंगे, मेड किसी तरह खाना बना के चली जाती होगी. पर सोशल मीडिया पर ये मिसाइल लेकर घूम रहे होंगे. ये पूरी कवायद ही लोगों के मन में अतिशय क्रोध और नफरत भर देती है. पर अगर सामने दुश्मन आ जाए तो ये शायद ही बोलेंगे. जबकि जो वाकई में लड़नेवाला है, उसकी मानसिक स्थिति बिल्कुल अलग होती है. वो नफरत या क्रोध का शिकार नहीं होता, वो मनाता है कि युद्ध ना हो. हालांकि अगर वो भी सोशल मीडिया पर आए तो युद्ध की ऐसे ही वकालत करेगा.

सोशल मीडिया हमारे साथ जबर्दस्त रूप से खेल रहा है. हमारी भावनाओं को ट्रिगर कर रहा है. हम अपने दोस्तों को बेवजह खो रहे हैं. हम लोगों से बेवजह नफरत कर रहे हैं, लोग हमसे बेवजह नफरत कर रहे हैं.

बिहार: उच्च जातियों का सब-नेशनलिज्म और पिछड़ी जातियों की ‘स्वेद क्रांति’

ऐतिहासिक रूप से बिहार समृद्ध राज्य रहा है. चंद्रगुप्त, अशोक के राज को भी छोड़ दें तो मध्ययुग में भी मुगल शासन के दौरान भी बिहार में शिक्षा या आर्थिक समृद्धि की कमी नहीं थी. किंवदंतियों के मुताबिक बक्सर के पास चौसा के टोडरमल अकबर के वित्त सलाहकार हुआ करते थे और उन्होंने टैक्सेसन का नया तरीका भी ईजाद किया था. यही नहीं, लैंड होल्डिंग और टैक्स के लिए कैथी लिपि और भाषा भी बन गई थी. जो आश्चर्यजनक रूप से बिल्कुल नये जमाने की थी. जिसमें अरबी, फारसी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं के भी शब्द थे. आज भी जमीनों के कागज उसी भाषा और लिपि में मिल जाते हैं. उत्तर भारत में मुगलकाल के टैक्सेसन को इस भाषा ने सुगम बनाया था. बाद में हिंदी की देवनागरी लिपि के प्रचलित होने के बाद इसका पतन हो गया.

पर कॉलोनियलिज्म के बाद बिहार की स्थिति गड़बड़ होने लगी. देश के बाकी हिस्सों में ब्रिटिश शासकों ने रैयतवाड़ी, महालवाड़ी इत्यादि नियम लागू किये पर पूर्वी भारत में सब कुछ जमींदारों के भरोसे छोड़ दिया. वो लगान वसूलने के अलावा लॉ एंड ऑर्डर भी देखते थे. यहां से बिहार का सोशल सिस्टम गड़बड़ हो गया. पास के ही बंगाल में बौद्धिक क्रांति हुई पर बिहार फ्यूडलिज्म में फंस गया. ब्रिटिश शासकों ने भी लैंड लॉक्ड होने की वजह से इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और नये उद्योगों को आने नहीं दिया. जबकि मुगल काल से चले आ रहे पुराने और लघु उद्योग नष्ट कर दिये गये. इसी प्रकार यहां पर शिक्षा भी ध्वस्त हो गई और एक खास वर्ग के हाथ में ही रह गई- सवर्णों के पास. जबकि आबादी में सवर्ण मात्र छठवां हिस्सा ही थे. इन्हीं के पास जमीनें भी थीं, नौकरियां थीं. तो समाज का बहुमत वाला वर्ग मजदूरी पर आश्रित हो गया. अरविंद दास अपनी किताब रिपब्लिक ऑफ बिहार में इस चीज को Bihar Fatigue के नाम से बताते हैं. ये किताब 1992 में आई थी पर अभी भी उतनी ही सत्य नजर आएगी.

आजादी के बाद भी बिहार में यही व्यवस्था बनी रही. 1967 तक सत्ता में उच्च जातियों का कब्जा रहा. उसके बाद ओबीसी पॉलिटिक्स शुरू हुई पर वो सोशल जस्टिस तक ही सीमित रही. सोशल जस्टिस को आर्थिक सुधार में बदलने के लिए या तो लैंड होल्डिंग में रिफॉर्म करना था या फिर उद्योग धंधे लाने थे. पर ये दोनों ही चीजें नहीं हो पाईं. इस बीच सत्तर के दशक से बिहार में अपराध बढ़ने शुरू हो गए. क्योंकि सरकारी ठेके मिलने लगे थे विकास कार्यों के लिए. जातिगत राजनीति में बिहार इतना फंस गया कि हरित क्रांति और 1992 के आर्थिक सुधारों का भी फायदा नहीं ले पाया. केंद्र की राजनीति भी बिहार के विपक्ष में ही रही. फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी से बिहार के रेवेन्यू को घाटा हुआ.

यहां पर एक चीज समझनी जरूरी है. बाकी राज्यों में भी सिमिलर समस्याएं थीं पर बाकी जगहों पर प्रगति के रास्ते निकले. बिहार में जाति बिल्कुल अलग तरीके से प्रगति पर हावी हो गई. उद्योगों के नहीं आने से ये परमानेंट व्यवस्था बन गया. आप ध्यान दें कि 1992 के बाद ही कई राज्यों में पैसा आया क्योंकि सॉफ्ट क्रांति हुई थी. बिहार में ये नहीं हो पाया. सॉफ्टवेयर क्रांति का भी राज्य फायदा नहीं ले पाया. निकटवर्ती यूपी ने भी इसका जबर्दस्त फायदा उठाया. सॉफ्टवेयर क्रांति ने बाकी जगहों पर जाति के सिस्टम को एक तरह से तोड़ा था. बिहार में ये नहीं हो पाने से राज्य बिल्कुल फंस गया.

जब सिर्फ जमीन और सरकारी ठेके ही रह गये तो बिहार में मारा मारी मचने लगी. ऐसा लगा कि हर कोई सर्वाइवल के लिए लड़ रहा है. सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सबसे क्रूरतम रूप सामने आ गया. जैसे पूरा राज्य ही एक आईलैंड पर जीने-मरने के लिए छोड़ दिया गया हो. लूट खसोट होने लगी. अपराध, प्रशासन, भ्रष्टाचार सब कुछ गड्डमड्ड हो गया. पर जाति की समस्या नहीं गई. यहां पर एक और बात समझनी है. राजधानी पटना ही बिहार नहीं है. गोपालगंज, चंपारण से लेकर किशनगंज-अररिया, पूर्णिया जैसे तमाम जिले हैं जो अपनी ही व्यवस्था में फंसे हुए हैं. पटना में तो इलीट वर्ग रहता है जो सीधा दिल्ली-मुंबई का रुख करता है.

इसके समानांतर दो चीजें हुईं- एक झारखंड राज्य की मांग और उसका परिपूर्ण होना और दूसरा बिहार के लगभग 70% हिस्से का लगभग हर साल बाढ़ग्रस्त होना. झारखंड की मांग बहुत पहले से थी और वहां के खनिज पदार्थ का राज्य को ज्यादा फायदा नहीं हो पाया. आज के हिसाब से वो क्लाइमेट चर्चा में चला जाएगा. पर तीस-चालीस साल पहले वो समृद्धि का आधार हो सकता था. बाढ़ की वजह से एक बड़ी आबादी, जिसका मुख्य हिस्सा बहुजन थे, वो अपनी खेती से भी हार गये.

ऐसी स्थिति में हर चीज का एक ही उपाय बचता है- करप्शन. इस प्रकार ये जीने का जरिया हो गया, एक लुब्रिकेंट की तरह जो सिस्टम को चला रहा है. इस जीने में भी अगर वर्चस्व बनाना है तो अपराध का सहारा लेना पड़ेगा. अगर सत्ता में पहुंचना है तो फिर अपराध-राजनीति के अंतर को ब्लर करना पड़ेगा. आखिरकार वही हुआ.

इस बीच एक चीज हुई थी. कुछ ओबीसी जातियां ताकतवर हुईं और उनको सत्ता और जमीन में हिस्सेदारी मिली. पर एक बड़ा हिस्सा इस चीज से वंचित ही रहा. ताकतवर ओबीसी जातियां नये जमाने की सवर्ण हो गईं और इस प्रकार एक नई खाई बन गई. ये ताकत पाना ही एक वजह है कि बिहार से ढेर सारे लोग आईएएस-आईपीएस बनने के लिए सालों लगे रहते हैं. हालांकि तैयारी करने वालों की संख्या और सेलेक्ट होने वालों की संख्या का अनुपात हृदयविदारक है. आपको आश्चर्य होगा कि कैसे हजारों लाखों युवाओं के बेशकीमती वर्ष एक कमरे में कैद बर्बाद हो रहे हैं.

इक्कीसवीं शताब्दी में दो चीजें ऑब्जर्व की गईं- बिहार के अपर क्लास और अपर कास्ट का माइग्रेशन, बिहार के लोअर क्लास और लोअर कास्ट का माइग्रेशन. एक में इंटेलिजेंशिया और समृद्ध लोग बाहर चले गये कभी ना आने के लिए. दूसरे में कम पढ़े लिखे और भूमिहीन लोग चले गये बाहर काम करने और बार बार त्यौहारों में वापस आने के लिए. पिछले दो दशक से तो यही इमेज चल रही है बिहार की. इतने ज्यादा लोग बाकी राज्यों में मजदूरी करने गये कि इसे बिहार की ‘स्वेद क्रांति’ भी कहा जा सकता है.

2008 में मुंबई में बिहारी मजदूरों से मराठी लोगों द्वारा मार-पीट के बाद एक नई प्रवृत्ति ने जन्म लिया. इस संघर्ष के मूल कारणों को नहीं देखा गया बल्कि इसे बिहारी अस्मिता के नाम से जोड़ा गया. मराठी अस्मिता का जवाब बिहारी अस्मिता. मराठी अस्मिता धीरे धीरे कम हो गई और बिहारी अस्मिता धीरे धीरे बढ़ गई.

यहां रोचक बात यह है कि बिहारी अस्मिता भी सवर्ण जातियों की ही सोच है. अस्मिता सवर्ण जातियों के साथ ही जुड़ी हुई है. इस सब-नेशनलिज्म ने बिहार के बारे में किसी क्रिटिकल एनालयसिस को रोकने का काम किया है. यही रिसोर्सफुल लोग बिहार की बदहाली का जिम्मेदार ओबीसी राजनेताओं को बताते हैं, सारे अपराधों का जिम्मेदार उन्हीं नेताओं को बताते हैं, बिना ये सोचे कि अपराध का आंकड़ा क्या था, कौन था अपराधी और किसने अपराध की इंडस्ट्री बैठाई थी. पर यही रिसोर्सफुल लोग बिहार के जंगलराज, बदहाल अर्थव्यवस्था, असीमित माइग्रेशन, कुशिक्षा इत्यादि को अपनी अस्मिता से जोड़ देते हैं. इनमें से ज्यादातर लोग शायद ही कभी बिहार वापस जाएंगे रहने के लिए. ये एक तरीके से एनआरआई की तरह हैं जिन्हें नॉस्टैल्जिया पसंद है, बदलाव नहीं.

यहां पर यह समझना जरूरी है कि बिहार किसी अभिशाप का शिकार होकर बदहाल नहीं है, बल्कि ये सिस्टमिक कुव्यवस्था का शिकार है. जिसकी जड़ में जातियों की ताकत और राजनीति है. आप देखेंगे कि हर बार चुनावों में लिखित एजेंडा सवर्ण मानसिकता से तैयार किया जाता है जबकि विधानसभाओं में मौखिक एजेंडा रेवड़ी बांटने के लिहाज से दलित-पिछड़ों के लिए तैयार किया जाता है.

बिहार का सिस्टम सवर्ण जातियों के लिए फेवरेबल है. लेकिन पिछड़ी जातियों के लिए नहीं है. सीधा सा हिसाब है- ताकतवर जगहों पर सवर्णों और नये सवर्ण हुए ओबीसी का कब्जा है. जो ताकतवर बन रहा है, वो इन्हीं को अपना मॉडल बना रहा है. करप्शन का फायदा इन्हीं को है और इनकी पीढ़ियां आसानी से बाहर जाकर अपना करियर बना सकती हैं. फंसा है वो जिसके पास ये रिसोर्स नहीं है.

बिहार की शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत चीजें दलितों-पिछड़ों के लिए है ही नहीं. जब चार साल पहले रूबी राय के फर्जी टॉपर होने का मामला आया था तो ये किसी प्रतिभा से नहीं जुड़ा था. प्रतिभाशाली तो राज्य छोड़कर बाहर चले जाते हैं. ये मामला था सिस्टमिक भ्रष्टाचार का जिसमें बिहार स्कूल एजुकेशन बोर्ड के चेयरमैन अपनी पत्नी सहित जेल में गये थे. इसी प्रकार बेकार स्वास्थ्य सिस्टम का मामला बिहार से निकल रहे डॉक्टरों से नहीं जुड़ा है, उनसे तो कोई लेना देना ही नहीं है. अगर वो पढ़कर वापस बिहार जाकर क्लीनिक खोल लें तो करोड़ों कमाएंगे. उनको क्या घाटा है. बिहार के आधे डॉक्टर तीन जिलों में ही हैं, इसी से समझा जा सकता है. ये सिस्टमिक समस्या है. जाति के सिस्टम की, उसके वर्चस्व को बनाये रखने की. इसकी जड़ में जाति ही है. जातिगत राजनीति और सामाजिक व्यवस्था का बहुत बड़ा घाटा हुआ है बिहार को. बिहार अपने लिए एक नोएडा नहीं बना पाया.

हां, एक भोजपुरी म्यूजिक/फिल्म इंडस्ट्री जरूरी बना ली जिसमें एक भाषा को ही अश्लील गायकों-गीतकारों के हवाले कर दिया गया. भोजपुरी की आर्थिक हैसियत सवर्ण एस्पिरेशन से मैच नहीं करती थी, इसलिए एकेडमिक्स से ये बाहर हो गई. तीस-चालीस साल पहले तक भोजपुरी अकादमी चलती थी, बाद में इसके अस्तित्व पर ग्रहण लग गया, क्योंकि ये किसी के काम की नहीं रही. दिलचस्प बात यह है कि अश्लील म्यूजिक बनाने में जाति का बंधन टूट गया. ये हर प्रकार की कुंठाओं को साधने का सहारा बन गया. ज्यादातर माइग्रेंट और कम शिक्षित जनता ही इसका ग्राहक है. सबसे मजेदार यह है कि इन अश्लील फिल्मों में रियल लाइफ का ओबीसी नायक भी सवर्ण ही बनता है. पर इसकी शुरुआत भी सवर्ण गायकों गीतकारों द्वारा ही हुई थी. एक सामंतवादी समाज के ताकतवर लोग ही इस तरीके की भाषा को जन्म दे सकते हैं. गरीब-पिछड़े इसकी शुरुआत नहीं कर सकते. पिछड़ी जाति से भोजपुरी कला के महानायक भिखारी ठाकुर आते थे जिन्होंने अपने कई गानों में सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया. बाद में जब अश्लीलता को सवर्ण समाज से स्वीकृति मिली तो नये पिछड़े कलाकार भी इससे सहर्ष जुड़ गये. फिर इसकी सामाजिक मान्यता हो गई क्योंकि इसमें पैसे बहुत मिलने लगे.

For further reading:

  1. Republic of Bihar- Arvind Das
  2. The Brothers Bihari- Sankrshan Thakur
  3. Rules or Misruled- Santosh Singh
  4. Bihar is in the Eye of the Beholder- Vijay Nambisan
  5. A Doctor’s Experiments in Bihar- Taru Jindal
  6. The New Bihar- N. K. Singh
  7. Making Sense of Bihar—An Autobiography of a Civil Servantof Bihar by Shree Shankar Sharan

लिबरल सबके राडार पर क्यों हैं?

आजकल हर जगह लिबरल बैशिंग हो रही है. हर कोई ये सवाल पूछता है कि लिबरल इस पर बोल क्यों नहीं रहे, उस पर क्यों नहीं बोल रहे. पर ये पता नहीं चलता कि लिबरल कौन है. जिसके बारे में भी जरा सा अंदाजा होगा कि ये लिबरल हैं, अगले दिन वो भी लिबरल्स से प्रश्न पूछते नजर आते हैं.

ब्रिटिश फिलॉसफर जॉन लोक के लेखन से लिबरलिज्म यानी उदारतावाद का जन्म हुआ था. फिर फ्रेंच क्रांति, अमेरिकी क्रांति, साम्राज्यवाद और दो विश्वयुद्धों से होते हुए 1950 के बाद उदारतावाद हर जगह छा गया. अगर इसके मूल में जाएं तो कई तरह की बातें मिलेंगी जो राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था के अलग अलग रूपों को डिफाइन करेंगी. इसमें अलग अलग देशों में उदारतावाद को लेकर अलग अलग परिभाषाएं भी मिलेंगी. लेकिन मोटा-मोटी उदारतावाद को जो परसेप्शन है, वो इस प्रकार है- राजनीतिक उदारतावाद के मुताबिक राजनीति में सबके लिए जगह है. फिर चाहे वो व्यक्ति या दल कितना भी एक्सट्रीम में अपनी बात क्यों ना कहे. आर्थिक उदारतावाद में हर कंपनी या एंटरप्रेन्योर के लिए बराबर की जगह है. सामाजिक उदारतावाद में जाति, मजहब और लिंग से परे सबके लिए बराबर मौका देने का उद्देश्य है.

यहां पर एक बात समझनी जरूरी है कि लेफ्ट और राइट दोनों की पॉलिटिक्स से ये अलग है. जहां लेफ्ट में समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था को लेकर अलग अवधारणा है, वहीं राइट पॉलिटिक्स में भी लिबरल्स से अलग ही अवधारणा है. कहीं-कहीं पर ये ओवरलैप करता है जिसकी वजह से कन्फ्यूजन होता है.

Liberal & Liberal

सवाल ये है कि लिबरल फेल क्यों हो रहे हैं?

पूरी दुनिया में ही लिबरल्स के ऊपर प्रश्न उठाये जा रहे हैं. दक्षिणपंथ समाज की हर समस्या के लिए लिबरल्स को जिम्मेदार ठहराता है. वहीं लेफ्ट खुद को लिबरल्स से अलग बताकर उन्हीं को दोषी ठहराता है कि दक्षिणपंथ के उभार के लिए वही जिम्मेदार हैं. तो ये समस्या पैदा हो जाती है कि लिबरल कौन है क्योंकि ये पता ही नहीं चलता. फिर ये पॉलिटिक्स अमूर्त रूप में आ जाती है और इस प्रकार इसे बचाने वाले कम होते जा रहे हैं.

इसके पीछे एक बड़ी वजह है. उदारतावाद समाज के हर फ्रैक्शन के अस्तित्व को स्वीकार करता है पर संघर्ष में यकीन नहीं रखता. अगर वो अर्थव्यवस्था में सबको बराबरी देने की वकालत करता है तो फिर ये सबके लिए है. किसी लोअर क्लास या कास्ट के लिए अलग प्रीफरेंस नहीं मिलेगा और किसी बड़ी कंपनी को दरकिनार नहीं किया जाएगा. हां, ये जरूर है कि कमजोर वर्गों के लिए कुछ प्रावधानों का इंतजाम किया जाएगा. यहां पर लेफ्ट पॉलिटिक्स उदारतावाद से अलग हो जाती है. लेफ्ट पॉलिटिक्स के कर्णधार बड़ी कंपनियों को बहुत सी समस्याओं का जिम्मेदार ठहरा देते हैं. वहीं दक्षिणपंथ स्वदेशी के नाम पर कई तरह की समस्याएं पैदा कर देता है. ठीक इसी तरह सामाजिक व्यवस्था में उदारतावाद सबको बराबर मौका देना चाहता है लेकिन किसी का डॉमिनेन्स नहीं चाहता. इसमें एक दिक्कत आती है कि बराबरी की बात खूब होती है लेकिन बराबरी बहुत धीरे धीरे आती है. जैसे उदारतावाद की वजह से जातियों में कहीं कहीं बराबरी आ रही है पर उससे ज्यादा बातें हो रही हैं. नतीजा ये होता है कि वामपंथ इस बराबरी को बराबरी मानने से इंकार कर देता है. वहीं दक्षिणपंथ बराबरी की इन बातों से चिढ़ जाता है, उसे लगता है कि बराबरी की बातें कर के पूरे समाज को बर्बाद किया जा रहा है.

इसी वजह से आपको समाज में वामपंथी और दक्षिणपंथी मिल जाएंगे पर लिबरल पॉइंट आउट करना मुश्किल होगा. कुछ समय पहले तक ये बताया जा सकता था कि कौन उदारतावाद की तरफ सन्मुख है. पर अब ये बताना मुश्किल है क्योंकि लोग तुरंत कन्नी काट लेते हैं.

लिबरलिज्म फेल इसलिए हो रहा है कि इसने वक्त के साथ एक इंटेल्कचुअल खाई पैदा कर दी. उदाहरण के तौर पर अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का मसला वो कभी जनता तक ले ही नहीं जा पाए. उन्होंने इस चीज को किताबों, आर्टिकल्स, व्याख्यानों के माध्यम से डिस्कस करने की कोशिश की. कोर्ट के फैसले को अंतिम फैसला मानते हुए वो हर वाद-विवाद को न्यायिक तरीके से सुलझाने में यकीन रखते थे. यहां पर वो चूक कर गये. जनता का एक बड़ा हिस्सा किताबों, आर्टिकल्स और व्याख्यानों- सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया – सबसे दूर था. अगर किसी सांप्रदायिक मुद्दे का लिबरल हल प्रमाण और तर्कों के आधार पर होना था तो जनता इसे भावना के आधार पर हल कर चुकी थी. इसी तरह अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का मसला जनता कभी समझ ही नहीं पाई. लिबरलिज्म के पैरोकारों को ये लगा कि आर्थिक सुधारों की वजह से जनता अपनी प्रगति में लगी रहेगी और बाकी चीजों को उदारतावाद से डील कर लिया जाएगा.

सोशल मीडिया ने छीनी सारी ताकत

ये व्यवस्था तब तक बनी रही जब तक कि सोशल मीडिया नहीं आ गया. पहले मीन्स ऑफ कम्युनिकेशन पर लिबरल्स का एकाधिकार था. अंग्रेजी पर कमांड और बहुत सी किताबों का ज्ञान उन्हें प्रभावी बनाता था. पर सोशल मीडिया आने के बाद ये एकाधिकार टूट गया. अंग्रेजी पर कमांड और किताबों का ज्ञान बेकार साबित हुआ. सौ-दौ सौ शब्दों में आप ये नहीं बता सकते कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता के पीछे क्या है और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के पीछे क्या है. दो सौ शब्दों की लड़ाई में लिबरल हार गये. जो लोग उनसे चिढ़े बैठे थे उन्होंने लिबरल्स को डिस्क्रेडिट कर दिया. फ्री स्पीच के चैंपियन को आप लगातार पचास गालियां दें तो इक्यानवीं में वो भी गाली दे सकता है. आप उनके स्टैंडर्ड पर नहीं पहुंच सके पर अपने स्तर पर घसीट जरूर लिया.

अगर उदारतावाद खुद को बचाये रखना चाहता है और समाज को आगे बढ़ाना चाहता है तो उसे खुद को रिइन्वेंट करना होगा. लोगों की भावनाओं का इन्क्लूजन जरूरी है. उसे नकार कर लिबरल नहीं बने रह सकते. उसे नकारते ही जनता आपको फासिस्ट घोषित कर सकती है. ये बहुत बड़ी विडंबना है. लोग आपके ही फ्रीडम ऑफ स्पीच की थ्योरी, आपके फासिज्म के विरोध का इस्तेमाल कर आपको ही फासिस्ट बता देगी और आप एक्सप्लेन नहीं कर पाएंगे. इसे कैसे करेंगे, वो सोचना होगा. बहुत बार ऐसा लगता है कि जनता अपनी उन भावनाओं का सम्मान चाहती है जिसे आप मूर्खतापूर्ण बताते हैं. इस पर एक बार ठहरकर सोचना होगा. क्योंकि उदारतावाद की भी कुछ बातें मूर्खतापूर्ण लगती हैं, कोई बोलता नहीं था. जैसे सुविधानुसार चीजों को सही गलत बताना. शराब, धर्म, मिथ, रिलेशन, फ्रीडम इत्यादि.

समाज का नेचर ही फासिस्ट है, जातिगत ट्रोलिंग फासिज्म का लक्षण है

समाज का नेचर ही फासिस्ट है

देश-दुनिया के संदर्भ में हम आजकल एक शब्द बार बार देख रहे हैं- फासिस्ट. ज्योंही आप कोई राजनीतिक चर्चा करेंगे, कोई व्यक्ति गंभीरता से बताएगा कि किस कदर फासिस्ट ताकतों ने राजनीति पर कब्जा जमाना शुरू किया है और जनता उनके साथ बही जा रही है. सुनकर ऐसा लगता है जैसे चार-पांच फासिस्ट लोगों ने दुनिया की हर चीज पर कब्जा जमा लिया है और लाखों-करोड़ों लोग उनके गुलाम बन गये हैं. क्या उन चार पांच लोगों ने कोई जादू किया है? वशीकरण मंत्र चलाया है?

इसकी वजह हमें अपने समाज में खोजनी होगी. हमारा समाज बहुत तरह के लोगों से बना है. इसमें धनी, निर्धन, योग्य, अतियोग्य, नाकारा, विद्वान, अनपढ़, व्यापारी, चोर हर तरह के लोग शामिल हैं. पर इस समाज में किसकी बात ज्यादा सुनी जाती है? उसी की बात ज्यादा सुनी जाएगी जिसका ग्रुप मजबूत होगा. जिसका ग्रुप मजबूत होगा वो मानसिक और शारीरिक हिंसा करने में समर्थ होगा. ताकत की मोटा मोटी यही परिभाषा है. जो ये हिंसा करने में समर्थ होगा, क्या वो अहिंसा का मार्ग अपनायेगा? नहीं अपनाएगा. वो अपने से कमजोर लोगों को दबाने की कोशिश करेगा. अगर वो अहिंसा का रास्ता अपनाता है तो उसके ताकतवर होेने का कोई मतलब ही नहीं है. एक समूह के पास हिंसक होने के अलावा दूसरा कोई ऑप्शन नहीं है.

फासिस्ट_ या तो तुम हमारे साथ हो या फिर उनके साथ हो? नॉन फासिस्ट_ आप किसके साथ हैं?

यहीं से शुरुआत होती है फासिज्म की. वो समूह हर वक्त हिंसा नहीं कर सकता. उससे थोड़े कमजोर समूह हर वक्त डरे नहीं रह सकते. तो सबसे ताकतवर समूह अपने से नीचे के समूहों को डिस्क्रेडिट करता है. उनकी बातों का मजाक बनाता है, उन पर तरह तरह के लांछन लगाता है, उन्हें समाज में व्याप्त बुराइयों का जिम्मेदार बताता है. इस तरीके से वो उन समूहों को व्यस्त रखता है ताकि वो सफाई देते रहें और अन्य समूहों से समर्थन ना हासिल कर पायें. वो कभी भी बैठकर सही आर्गुमेंट करने की कोशिश नहीं करेगा. क्योंकि ऐसा करने में अधिकारों को खो देने का डर रहता है. उन्हें ताकत शेयर करनी पड़ेगी जो कि वो नहीं चाहते. उन्हें सवालों का जवाब देना पड़ेगा, जो कि नहीं देना चाहते. यही फासिज्म है.

इसी चीज को रोकने के लिए एक डेमोक्रेटिक समाज की संकल्पना की गई. जिसमें ताकतवर व्यक्ति की जगह बार बार बदलने की संभावना होती है. वो स्थायी रूप से ताकतवर नहीं हो सकता. इससे पहले ताकत का ट्रान्सफर युद्ध से होता था. डेमोक्रेसी के शुरुआती वर्षों में सही परिणाम मिले. एक बराबरी वाले समाज की तरफ दुनिया अग्रसर हो रही थी.

लेकिन जैसा कि आर्गुमेंट है कि समाज का नेचर ही फासिस्ट है, ताकत की आकांक्षा में पूर्ववर्ती तथाकथित श्रेष्ठ लोगों ने फिर से मुद्दों को उस तरीके से मोड़ना शुरू किया जिससे उनका आधिपत्य स्थापित हो जाए. इसके लिए फिर पुराने ही तरीकों का सहारा लिया गया. इस वजह से डेमोक्रेसी की दरारें दिखने लगीं.

अगर हम अपने देश को देखें तो यहां पर जाति की संकल्पना फासिस्ट है. ये कुछ समूहों का आधिपत्य बनाती है, बाकी के अस्तित्व को ही नकारती है. अगर ऊपर के तर्कों के आधार पर देखें तो भारत में डेमोक्रेसी की शुरुआत के बाद पिछड़े वर्गों की भागीदारी धीरे धीरे सुनिश्चित होने लगी. पर एक वक्त के बाद फिर से ऐसा लग रहा है जैसे तथाकथित ऊंची जातियां फिर अपना आधिपत्य स्थापित करने में लग गई हैं. इसके लिए तमाम कुतर्कों का सहारा लिया जाता है. हर उस चीज को डिस्क्रेडिट कर दिया जाएगा जो बराबरी की बात करती है.

फासिस्ट ताकतों की विशेषता होती है कि ये हर वक्त आदर्शों की बात करते रहते हैं पर अपने लक्ष्य को पाने के लिए सारे आदर्शों की आहुति दे देते हैं. आदर्शों की बात करने से हर वक्त एक नैतिक हाई ग्राउंड रहता है, आप श्रेष्ठता श्रेणी में ऊपर रहते हैं. पर बीच में मौका देखकर सारे आदर्शों को दरकिनार कर अपना लक्ष्य हासिल कर लेते हैं. फिर वापस आदर्शों के गुणगान पर आ जाते हैं.

ट्रोलिंग फासिज्म का लक्षण है

ट्रोलिंग इसी फासिस्ट मानसिकता का एक लक्षण है. अगर आप ट्रोलिंग को ध्यान से देखें तो ये ऊपरी जातियों का ही टूल है. क्योंकि इनके पास शब्द हैं, कल्चरल कैपिटल है और किसी को कुछ भी कह देने की बेशर्मी है. ट्रोलिंग का इस्तेमाल कर ये लोग जातिगत, स्त्रीद्वेषी, धर्मद्वेषी और हिंसात्मक बातें आसानी से कह जाते हैं. जिस सोशल मीडिया से पिछड़ी जातियां सशक्त हो रही हैं, उसी मीडिया का इस्तेमाल कर ऊपरी जातियां उन्हें डिस्क्रेडिट करती हैं. जैसे कि पिछड़ी जातियों के ज्ञान को लेकर, उनकी स्पेलिंग को लेकर, उनके रूप रंग चरित्र इत्यादि को लेकर उन पर लगातार प्रहार करती हैं. ऐसी इमेज बनाती हैं जैसे कि वो कोई बुरा मनुष्य हो. इस दौरान वो हर उन बातों का सहारा लेते हैं जो आम जनजीवन में कहने से हिचकते हैं. पिछले पचास साठ सालों में एक बदलाव आ रहा था जिसमें पिछड़ी जातियों के मुंह पर ये बात कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी किसी की. पर अब सोशल मीडिया के माध्यम से वो सारी बातें कही जा रही हैं.

इसका काम करने का तरीका बहुत ही भयावह है. चूंकि ये मानसिकता होती है या यूं कहें कि फासिज्म एक मानसिक बीमारी है तो भी सही है. इस मानसिक बीमारी में ये समूह सिर्फ दूसरे समूह को प्रताड़ित ही नहीं करता, जरूरत पड़ने पर अपने समूह के कुछ लोगों का बलिदान देने में भी नहीं हिचकता. क्योंकि इसके लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है, इसके लिए डॉमिनेशन महत्वपूर्ण है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण सुशांत सिंह राजपूत का केस है. सुशांत की बहुत सारी फिल्में चलीं और बहुत सारी नहीं चलीं. वो एक राइजिंग स्टार थे और खुद को किसी आइडेंटिटी से नहीं जोड़ते थे. ना तो उन्होंने कभी खुद को प्राउड बिहारी जैसे विशेषण दिये ना ही प्राउड राजपूत से जोड़ा. सुशांत ने दो साल पहले राजपूती प्राइड को लेकर चले अभियान के दौरान अपने नाम से राजपूत हटा दिया था. इसके लिए उन्हें बहुत गाली खानी पड़ी. यहां पर ये चीज नोटिस करने लायक है. उस वक्त पर कथित ऊंची जातियां सुशांत को त्यागने पर आमादा थीं. क्योंकि उनकी राह में वो रोड़ा बन रहे थे. राजपूती अभियान की गाड़ी के चक्कों में वो पैना फेंक रहे थे. उस वक्त उनको बुरी तरह ट्रोल किया गया.

दो साल बाद उनकी असामयिक मौत हुई. उनकी मौत के तुरंत बाद कुछ लोगों ने एक विकृत मानसिकता के तहत खुशी जताई और कहा कि इसने तो राजपूत शब्द अपने नाम से हटा दिया था. तब तक उस एजेंडे को बल मिल रहा था जो दो साल पहले चलाया गया था. पर अचानक अहसास हुआ कि इस दुखद घटना का इस्तेमाल कर किसी वृहद एजेंडे को पूरा किया जा सकता है. इसके बाद अचानक बॉलीवुड के कई बड़े एक्टरों को सुशांत की मौत का जिम्मेदार बना दिया गया. इसको लेकर नये किस्म की ट्रोलिंग हुई. इसमें वो सारी बातें कही गईं जो उन एक्टर्स के सामने कहने की कोई भी हिम्मत नहीं कर सकता था. नेपोटिज्म से लेकर दूसरों द्वारा बुली किया जाना, हर बात पर ट्रोलिंग हुई. ऐसा कहा गया कि इन एक्टर्स ने सुशांत को डिप्रेशन में ला दिया. ध्यान रहे कि इस ट्रोलिंग का ना तो सुशांत से लेना देना था ना ही उन एक्टर्स से. बल्कि इसका उद्देश्य था समाज में अपना डॉमिनेन्स दिखाना. क्योंकि मौत की जांच तो कानूनी तरीके से ही हो सकती है.

यहां पर फासिस्ट मानसिकता को समझना होगा. इस केस को आधार बनाकर इतने नये चक्रव्यूह रच दिये गये कि सच और झूठ का पता लगाना मुश्किल हो गया. फिर एक दिन अचानक पता चला कि सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया का नाम आ रहा है. अब ट्रोलिंग बिल्कुल ही अलग दिशा में मुड़ गई. जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं. लेकिन एक ऑर्गेनाइज्ड ट्रोलिंग अलग एजेंडे के तहत काम कर रही है. अब जांच जैसे होगी, जो नतीजे आएंगे, वो आएंगे. इसमें फाइनेंशियल फ्रॉड हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है. क्या नतीजा आएगा वो आनेवाले वक्त की बात है. उनकी मौत का दुख सबको है, हर कोई सच जानना चाहता है. पर उसे लेकर जो ऑर्गेनाइज्ड ट्रोलिंग हुई उसने बाकी सारे मुद्दों को गौण कर दिया.

एक नया सेंटिमेंट चल पड़ा कि ऊपरी जातियों का इस देश में रहना मुश्किल हो गया है. पिछड़ी जातियों के इतने अधिकार हैं, आप सवर्णों के अधिकारों के बारे में एक बात नहीं बोल सकते. इस एजेंडे को लगातार फैलाया गया. धीरे धीरे इस केस को ऐसे मोड़ पर ला दिया गया कि जो कोई भी इसमें एक तार्किक बात बोलेगा, वो एक फेमस एक्टर की हत्या में शामिल बताया जाएगा. उसके बारे में कहा जाएगा कि उसने हत्यारों से पैसे लिए हैं. ध्यान देने की बात यह है कि ये तो परिवार भी नहीं कह रहा. दो लड़कियों के बारे में लोग ऐसी ऐसी बातें कह रहे हैं, लिख रहे हैं जिनको सामान्य समाज में अनुमति नहीं मिलती. इस चीज में इनका साथ वो लोग भी दे रहे हैं जो इन्हीं बातों के खिलाफ लड़ते थे. जैसे कि ढेर सारे लोग मिलकर उन लड़कियों का चरित्रहनन कर रहे हैं. इसमें प्रोफेशनल चरित्रहनन करने वाले और प्रोफेशनल क्रांतिकारी दोनों ही शामिल हैं.

आप इसमें ध्यान देंगे तो पाएंगे कि ये पूरी ट्रोलिंग ही किसी और एजेंडे के लिए है. इसका सुशांत से कोई लेना देना ही नहीं है. अगर किसी ने उस एजेंडे के खिलाफ बोला तो ये उसके दुश्मन बन जाएंगे. फिर वही फासिस्ट तरीका अपनाएंगे- डिस्क्रेडिट करने का. ताकि उस व्यक्ति की आवाज की कोई वैल्यू ही ना रहे. वैसी बातें कहेंगे जो कहने से लोग कतराते हैं.

इस थ्योरी को बल इसलिए भी मिलता है कि सुशांत की मौत के कुछ दिन बाद उनकी बहन की भी ट्रोलिंग होने लगी थी. क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे का एक वीडियो बनाकर सुशांत को अलविदा कहा था और फैन्स को भी मूव ऑन करने को कहा था. तो उनको भी बुरा भला कहा जाने लगा. जैसा कि हमने ऊपर भी डिस्कस किया था कि फासिस्ट ताकतें अपने लक्ष्य के लिए किसी का भी चढ़ावा चढ़ा सकती हैं. अगर आप उनके मन की बात ना करें तो आप ही हत्यारे साबित हो जाएंगे, आपका चरित्र खराब हो जाएगा, आपका काम खराब हो जाएगा.

इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है स्विंग फासिस्ट्स पर. जैसे कि स्विंग वोटर्स होते हैं जो मतदान के दिन अपना वोट डिसाइड करते हैं, वैसे ही स्विंग फासिस्ट होते हैं. वो ट्रोलिंग के दिन अपना पक्ष डिसाइड करते हैं और लोगों को ट्रोल करते हैं. ये स्वयंसेवी होते हैं, बस इनकी भावनाएं भड़काई जाती हैं. इन्हें लगता है कि यही सही है. फिर वो लोग ऐसी बातें कह जाते हैं या कर जाते हैं जिनका वास्तविकता या सामान्य चीजों से कोई लेना देना नहीं होता. इन्हें फासिज्म का जॉम्बी भी कह सकते हैं. जब तक सुशांत की मौत की जांच पूरी होगी तब तक ना जाने कितने संस्थान, ना जाने कितने लोग डिस्क्रेडिट किये जा चुके होंगे.

इसके साथ ही ऐसी बातें स्थायी हो जाएंगी जो कहने में लोग हिचकते थे. जैसे कि सवर्णों को न्याय नहीं मिलता, सब कुछ तो पिछड़ों के लिए हैं. मुस्लिम एक्टर्स के सामने हिंदू एक्टर्स को झुकना पड़ता है. औरतें गोल्ड डिगर होती हैं. फलाने ने तो पैसा खाया. फलाने ने ऐसा किया. अगर आप ध्यान देंगे तो ऐसी बहुत सी बातें अपना स्पेस पकड़ती जाएंगी. केस का जो होगा, वो होगा. पर फासिज्म अपना काम करेगा. उसको केस से कोई लेना देना नहीं. इस केस के बहाने वो अपने नये सिपहसालार बना लेगा.

इसीलिए कोड ऑफ कन्डक्ट बनाये गये थे. ताकि समाज का फासिज्म उस पर हावी ना हो जाए. लेकिन सोशल मीडिया आने के बाद फासिज्म को एक नया स्पेस मिल गया है. स्वयंसेवी फासिज्म एक्टिव है. यही सबसे खतरनाक होता है. नेता और राजनीति तो बदलते रहते हैं. स्वयंसेवी फासिज्म ने अगर एक बार दिमाग में कब्जा कर लिया तो बरसों लग जाते हैं मुक्ति पाने में. क्योंकि सारी जिम्मेदारी तो नेताओं पर डाल दी जाती है. समाज अपने फासिज्म के लिए नेताओं को दोषी ठहरा देता है. फिर बाद में कोई नेता ही आता है जो समाज के फासिज्म को रोकता है और सही दिशा में ले जाता है. वो शांति का स्वर्णयुग होता है.