वॉर: हमारे देश के युवाओं की कन्फ्यूज्ड सोच और कल्पना को दर्शाती हुई फिल्म

गांधी जयंती के दिन रिलीज हुई फिल्म ‘वॉर’ बहुत कुछ करना चाहती है. इसमें दिल के अच्छे नायक हैं, देशभक्त हैं. इन्हें सैनिकों की चिंता है. इनके लिए पहले वतन, दूसरे पर वतन और फिर तीसरे पर भी वतन है. ये लोग फैशनेबल भी हैं, कंटेपररी डांस करते हैं, स्टाइलिश हैं. पर इन्हें अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का क भी पता नहीं, आतंकवाद पर सतही ज्ञान है और ये नहीं पता कि गद्दार के नाम पर किसी को मारने चलो तो अपने निर्दोष सैनिक भी मर रहे हैं. ये बिना हेल्मेट विदेश में बाइक चेज करते हैं और बिल्कुल जेम्स बांड वाले अंदाज में कहीं पर भी गोली बारूद चला साफ निकल आते हैं. यही नहीं, गद्दार का तमगा लिए हुए फैशनेबल युवा दिल्ली मेट्रो में एक दूसरे से मिलते भी हैं और हाई एलर्ट पर काम कर रही भारत की गुप्तचर एजेंसी को भनक नहीं लगती. ये फिल्म जाने-अनजाने में बहुत सामयिक है.

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हमारे देश के युवाओं की सोच और कल्पना को दर्शाती हुई फिल्म है.

कहानी के एक पहलू में दो खूबसूरत नायकों का स्टाइल है

फिल्म वॉर में बॉलीवुड के दो नायकों वाली फिल्मों के नॉस्टैल्जिया को नये अंदाज में पेश किया गया है. दो खूबसूरत नायकों की कहानी में देश, आर्मी, गुप्तचर एजेंसी, आतंकवादी, गद्दारी और खूबसूरत लोकेशन्स जोड़कर युवाओं के लिए एक बेहतरीन विजुअल एक्सपीरिएंस का निर्माण किया गया है. बर्फ में कार चेज, मोरक्को की सड़कों पर बाइक चेज और बर्फीली वादियों से गुजरते हुए प्लेन में फाइट- ये सारे दृश्य युवा हृदय को विस्मृत करने के लिए काफी हैं.

War Trailer-Hrithik Roshan and Tiger Shroff’s stupendous fight scenes will remind you why they’re the best in the action biz

खास तौर से बिना हेल्मेट और लाइसेंस बाइक चलाकर हजारों रुपये का चालान बनवाते हुए भारतीय युवाओं को मोरक्को में बिना किसी रूल की परवाह करते हुए चश्मा लगाये बाइक चलाते हुए ये नायक अच्छे लगेंगे. प्लेन वाली फाइट के साथ एक रोचक पहलू जुड़ता है. सिनेपोलिस में अगर आप मूवी देख रहे हैं तो इंटरवल के ठीक बाद टाइगर श्राफ ने एक विज्ञापन के लिए ठीक वैसा ही सीक्वेंस शूट किया है. ये तय नहीं हो पाता कि फिल्म और विज्ञापन दोनों में से किसके सीक्वेंस ज्यादा अच्छे हैं.

ऋतिक रोशन का एंट्री सीन काफी अच्छा बना है. बिल्कुल स्टाइलिश. उसी तरह टाइगर श्राफ का एंट्री एक्शन सीक्वेंस भी बहुत अच्छा है. पर सीक्वेंस खत्म होते होते लुढ़क जाता है. क्योंकि वो टाइगर के एटिट्यूड को स्थापित नहीं कर पाता. बॉलीवुड में जब भी दो नायकों की फिल्म बनी है, दोनों की अलग पर्सनैलिटी स्थापित की जाती है. पर इस फिल्म में टाइगर हमेशा ही ऋतिक के सामने स्टूडेंट की तरह नजर आते हैं. ये फिल्म का अच्छा पहलू भी है, हास्य की स्थिति पैदा होती रहती है.

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फिल्म के एक्शन सीक्वेंस और इनके पीछे म्यूजिक और लोकेशन बेहद खूबसूरत हैं. किशोरों को ये चीजें स्थाई तौर पर याद रह जाएंगी. कहानी थोड़ी और सधी हुई होती तो ये ऋतिक के लिए दूसरा ‘कहो ना प्यार है’ साबित हो सकती थी. बड़ी (महंगी) फिल्मों के स्टार के तौर पर उनकी इमेज को ये फिल्म पुख्ता करती है.

कहानी के दूसरे पहलू में खालिद एक सेक्युलर मुस्लिम है

वॉर फिल्म में एक दृश्य है जहां आर्मीमैन खालिद (टाइगर श्राफ) अपने सीनियर और देशभक्ति के रास्ते से भटक गये ऑफिसर कबीर (ऋतिक रोशन) से कहता है- मैंने आपको अपना खुदा माना था, पर आप गद्दार निकल गये. कबीर जवाब देता है- पहले लोग पत्थर की मूर्तियों को भगवान मानते हैं और बाद में जब मूर्तियां टूट जाती हैं कहते हैं कि भगवान कैसे टूट सकता है.

यहां पर खालिद नाराज हो सकता था, पर हुआ नहीं. खुदा और मूर्तियों को लेकर कोई द्वेष नहीं पालता.

फिर एक जगह दोनों गजब की खूबसूरत लोकेशन में, जहां बर्फीली वादियों के बीच होली खेलने के लिए एक सेट लगाया गया है, एक गाने पर नृत्य करते हैं- जय जय शिवशंकर, आज मूड है भयंकर, रंग उड़ने दो.

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यहां भी खालिद रंग और शिवशंकर इत्यादि को लेकर कोई परहेज नहीं करता. उपरोक्त दोनों दृश्यों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि खालिद एक सेक्युलर मुस्लिम है.

पर खालिद मुसलमान भी है, तो सबूत देना पड़ेगा

हालांकि एक अन्य दृश्य में कबीर खालिद के बारे में बोलता है कि मैं उसे जानता हूं, शराब उसके लिए हराम नहीं, हराम से भी बदतर है. यहां पता चलता है कि खालिद इस्लाम की कुछ चीजों पर यकीन करता है. या फिर ये हो सकता है कि मेडिकल/लॉजिकल वजहों से भी खालिद शराब को हराम के बजाय हराम से बदतर समझता हो.

लेकिन खालिद पर दबाव है, क्योंकि उसे साबित करना है कि उसकी रगों में उसके गद्दार पिता का खून नहीं बह रहा है. वो गद्दार पिता, जिसे कबीर ने ही मारा था.  तमाम दांव-पेंच और रहस्यों के बाद फिल्म के अंत में खालिद को भारतीय राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री द्वारा वीरता का सर्वोच्च पुरस्कार मिलता है.

सैनिकों को लेकर दुखद दृश्य बनते हैं

इसी तरह से फिल्म में एक जगह कबीर और खालिद इराक-मोरक्को-पाकिस्तान इत्यादि देशों से ऑपरेट कर रहे आतंकवादी इलियासी का प्लान बेनकाब करते हैं- मतलब हमारी सैटेलाइट ब्रह्मा पर मिसाइल दाग देंगे ये और बॉर्डर पर हमारे सैनिकों का हमसे कॉन्टैक्ट टूट जाएगा. मतलब एक और करगिल?

यहां पर कई रोचक चीजें एक साथ होती हैं. इस दृश्य के पहले अपने देश के ‘गद्दारों’ से निपटते हुए बड़ी बेरहमी से कबीर भारतीय सेना के कई जवानों को मार गिराता है. उन्हें प्लेन से फेंक देता है. गद्दार तो बस एक अधिकारी होता है, पर उसके पहले ढेर सारे जवान मारे जाते हैं, जिन्हें पता भी नहीं होता कि क्या हो रहा है.

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दूसरी बात, करगिल के परिप्रेक्ष्य में बनी इस कहानी में एक पॉइंट मिसिंग है. करगिल की घुसपैठ को सैटेलाइट से नहीं पकड़ा गया था. एक गड़ेरिए ने भारतीय सेना को बताया था.

तो इस फिल्म ने हिंदू-मुस्लिम और सेना पर चल रहे किसी डिबेट में पड़ने से इंकार कर दिया है. इस वजह से फिल्म को देश-काल से परे रखकर एक फिक्शन के तौर पर बिना विश्लेषण किए देखा जा सकता है.

आतंकवाद पर बात करते हुए एक नई चीज दिखाई है

अमूमन बॉलीवुड फिल्मों में ज्यादा रिसर्च नहीं करते, फौरी तौर पर जोड़कर दृश्य बना लेते हैं. इस फिल्म में भी आतंकवाद को दिखाने के लिए मोरक्को, इराक इत्यादि को दिखाया गया है. चाय की दुकानों और ओपन कैफे में बड़े बड़े आतंकवादी बात करते हुए नजर आए हैं. पर नई चीज के तौर पर ये आतंकवादी भारत की ब्रह्मा सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराने का प्लान बनाते हैं.

ध्यान रहे कि कुछ दिन पहले भारत ने घोषणा की थी कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराने की क्षमता हमने हासिल कर ली है. इसी तरह इसरो भी चंद्रयान को लेकर काफी चर्चा में रहा है. पर फिल्म में इसरो के चेयरमैन गद्दार निकलते हैं. वहीं आतंकवादी ब्रह्मा सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराने के लिए आर्कटिक सर्कल को चुनते हैं. ये चुनाव रोचक है क्योंकि इन जगहों पर यूरोप और अमेरिका की रिसर्च चलती रहती है. आतंकवादी अगर इसे इस्तेमाल करते हैं तो उनके लिए ये उपलब्धि समान है. फिल्म में आतंकवादी क्लेम करते हैं कि कुछ ऐसा होगा कि लोग ओसामा को भूल जाएंगे.

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यही नहीं, आतंकवादियों ने दुनिया की एक प्रतिष्ठित डॉक्टर को अपने प्लान में शामिल कर लिया है जो प्लास्टिक सर्जरी कर किसी का हुलिया और शरीर भी बदल देती है. इतना कि बूढ़ा हो चुका आतंकवादी इलियासी प्लास्टिक सर्जरी कराकर एक तगड़े युवा के रूप में सामने आता है. वहीं एक एजेंट भी प्लास्टिक सर्जरी कराकर एक ‘सुपर फाइटर’ एजेंट का ना सिर्फ हुलिया बल्कि सारी ताकत भी अपने अंदर पाता है.

इन सारी बातों के बावजूद फिल्म का फोकस ‘देश के गद्दारों’ पर है. फिल्म के मुताबिक असली गद्दार तो हमारे देश की सेना, संस्थाओं इत्यादि में बैठे हुए हैं जिन्हें पैसे देकर आतंकवादी अपना काम करा सकते हैं.

जेम्स बांड के लिए ऋतिक दावेदार, पर बिहारी एक्सेंट छोड़ना पड़ेगा

कबीर का एक बहुत अच्छा संवाद है. विलेन से लड़ते हुए खालिद की शहादत पर कबीर कहता है- उसकी मम्मी की इच्छा पूरी हो गई कि बेटा शहीद हो. ये एक कैजुअल तरीके से कहा गया संवाद है, जो जेम्स बांड की याद दिलाता है.

हालांकि ऋतिक फिल्म में कई जगह अति भावुक हो जाते हैं, जो उनके कैरेक्टर से मेल नहीं खाता. पर कई जगह चेहर पर क्रूरता दिखाकर वो जेम्स बांड फ्रेंचाइजी के भारतीय हीरो होने की संभावना जगाते हैं. पर उनका अंग्रेजी एक्सेंट मात खा जाता है. एक जगह ‘स्टैंड अप’ बिल्कुल देसी अंदाज में बोलते हैं. कहीं कहीं तो ऐसा लगता है कि ‘सुपर थर्टी’ के लिए की गई प्रैक्टिस का असर अभी भी बाकी है.

फिल्म में वाणी कपूर भी हैं, एक सिंगल मदर के रूप में. उनकी बच्ची है, जिसका रोल वाणी से ज्यादा है. आशुतोष राणा भी हैं. ना ना करते हुए एक जगह वो भी विलेन लगने लगते हैं, क्लीशे तरीके से. पर बाद में मामला संभल जाता है. और भी किरदार हैं, पर उनको व्यक्तिगत रूप से जानने पर ही उन पर ध्यान जाएगा.

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क्या गांधी को 1921 से लेकर 1948 तक के 27 वर्षों के लिए भी एक आत्मकथा लिखनी चाहिए थी?

महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ 1927 के आस-पास प्रकाशित हुई थी. इसमें उनके बचपन से लेकर 1921 तक के जीवन का विस्तृत वर्णन है. पूरी आत्मकथा दो पत्रिकाओं ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित हुई थी. बाद में महादेव देसाई ने 1940 के आस-पास इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया था और ये किताब तब यूरोप में भी पहुंची. अमेरिका में ये किताब 1948 में प्रकाशित हुई. जिस साल गांधी की हत्या हुई. अमेरिका के साथ मौका और व्यापार जुड़ा ही रहता है.

इस आत्मकथा को पढ़ने के साथ आप कई तरह की दुविधाओं से मुक्त हो जाते हैं. आप जैसे हैं, वैसे ही रहने लगते हैं और उसमें गर्व महसूस करते हैं. ये संयोग की बात है कि गांधी के मरने के बाद दुनिया में मोटिवेशनल स्पीकर्स का व्यापार खुला और लगभग सत्तर सालों तक ये व्यापार चलता रहा है. इसमें व्यक्तित्व को निखारने की तमाम तरकीबें बताई जाती हैं. हालांकि अगर आप कई किताबें पढ़ें और कई लोगों की बातें सुनें तो कई जगह ये बातें एक दूसरे को काटते रहती हैं. जैसे कि मेरे होमटाउन में रहनेवाले एक मित्र ने दो साल पहले फोन करके पूछा था कि रोंडा बर्न की किताब ‘द सीक्रेट’ में तो ऐसा लिखा है कि जो चाहोगे, वो मिल जाएगा, अपने मन में हमेशा सोचते रहो उसके बारे में. इस चीज को लेकर वो बड़ा कन्फ्यूज था. क्योंकि अन्य किताबों में बिल्कुल अलग बातें कही थीं. गीता में कहा है कि निष्काम भाव से कर्म करो, फल की चिंता मत करो. बहुधा लोगों को ये बातें समझ नहीं आती हैं. गांधी के कहे में ऐसा कोई कन्फ्यूजन नहीं है.

लोगों को लगातार ये बताया जाता है कि कॉन्फिडेंस फेक करो, करते रहो, अपने आप आ जाएगा. पर ऐसे विचार जटिलताएं पैदा करते हैं. गांधी की आत्मकथा पढ़ने से पता चलता है कि ऐसा कुछ नहीं करना है, आप जैसे हैं, वैसा स्वीकार करिए और अपने कर्म से जुड़े रहिए. अगर एक काम नहीं होता है, तो दूसरा करिए. जब विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाते थे तो गांधी कांग्रेसियों को समाज सेवा में जुटने की सलाह देते थे. वो मानते थे कि नहीं, ये अलग बात है. पर ये सलाह आज भी कारगर है. जीवन में जटिलताएं पैदा होने पर हम हमेशा कोई ना कोई काम करना चुन सकते हैं. ये एकदम साधारण बात है, अगर हम अपनी स्थिति को स्वीकार कर लें तो. स्ट्रगल-ट्रुस-स्ट्रगल. विपिन चंद्रा ने गांधी की तकनीक के बारे में यही लिखा है. संघर्ष-शांति-संघर्ष. लगातार करते रहिए.

सबसे महत्वपूर्ण बात, गांधी अपनी बात कहते हुए किसी भी महान व्यक्ति का उदाहरण नहीं देते हैं. बिल्कुल सरल बातें करते हैं. हमें खुद पर यकीन रखने के लिए किसी महान व्यक्ति का वैलिडेशन नहीं चाहिए. हालांकि उन्होंने टॉल्सटॉय, जॉन रस्किन और एक गुजराती कवि श्रीमद रामचंद्र के लिखे का जिक्र जरूर किया है.

पर ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में 1921 तक का ही जिक्र है. यहां तक का गांधी का जीवन भारतीय जनता की क्रूर और निर्मम आलोचना से दूर ही था. इसी वक्त गांधी पर पहला बड़ा आरोप लगा. चौरी-चौरा कांड के परिप्रेक्ष्य में असहयोग आंदोलन को विफल बनाने का आरोप और खिलाफत आंदोलन में टर्की के मुस्लिमों का समर्थन कर भारत में हिंदू-मुस्लिम कट्टरपंथ को सहने का आरोप. इसके बाद आंदोलन और कांग्रेस दोनों ढीले पड़ गये. गांधी समाज सेवा में लग गये. 1925 में RSS का उदय हुआ. सी आर दास और मोतीलाल नेहरू ने गांधी से अपना मोहभंग कर ब्रिटिश राज द्वारा कराए गये चुनाव में हिस्सा लिया. उसी दौर में गुजरात समेत कई राज्यों में दंगे हुए और लगातार छिटपुट दंगे होने लगे. वहीं भारत के कुछ युवा (ज्यादा युवा नहीं) सशस्त्र क्रांति में हिस्सा लेने लगे. ब्रिटिश सरकार उनके प्रति निर्मम रही और बहुतों को युवावस्था में ही प्राणों की आहुति देनी पड़ी. गांधी का असली भारतीय टेस्ट होना बाकी था. फिर एक तारीख आई. 23 मार्च 1931. सरदार भगत सिंह को इसी दिन फांसी की सजा हुई थी. उनके साथ दो और युवाओं राजगुरू और सुखदेव को भी फांसी हुई. पर आम जनमानस गांधी को उन दो युवाओं की मौत का जिम्मेदार नहीं मानता या मानता भी है तो खुले तौर पर उल्लेख नहीं करता. आम जनमानस भगत सिंह की मौत का जिम्मेदार गांधी को मानता है.

क्या गांधी अपने ऊपर लगे इस आरोप से कभी मुक्त हो पाएंगे?

गांधी पर आम जनमानस सीधा आरोप लगाता है- गांधी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे. पर उन्होंने नहीं बचाया क्योंकि उनको डर था कि भगत सिंह उनसे ज्यादा लोकप्रिय हो जाएंगे.

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ये आरोप अपने आप में इतना रोचक है कि इसकी तमाम व्याख्यायें हो सकती हैं. आम जनमानस मानता है कि ब्रिटिश गांधी की बात मानते थे, उनके कहे पर भगत सिंह को छोड़ देते. आम जनमानस भगत सिंह का कहा नहीं सुनता. भगत सिंह का पहले प्लान था कि कोर्ट जाते हुए उनके साथी उन्हें पुलिस की कैद से छुड़ा लेंगे. पर बाद में प्लान बदल गया क्योंकि भगत सिंह को यकीन था कि उनकी शहादत से देश के युवाओं में नया जोश पैदा होगा. ऐसा हुआ भी. भगत सिंह बिल्कुल सही थे. सौ साल बाद भी भगत सिंह का नाम युवाओं में जोश पैदा करता है और ये कोई मामूली बात नहीं है. आम जनमानस सिर्फ भगत सिंह को ही क्यों गांधी के हाथों बचाना चाहता है? अगर गांधी के कहे पर ब्रिटिश सरकार भगत सिंह को छोड़ देती तो बाकी दो क्रांतिकारियों को लेकर जनता अपना रोष प्रकट करती क्या?

खैर, इस बारे में कमेंट करने से पहले ब्रिटिश राज के नेचर को समझना अति आवश्यक है. ब्रिटिश राज किसी मुगल शासक या तैमूर या शक-कुषाण-हूण वंश की तरह नहीं था. पहले के बहुत सारे विदेशी आक्रांता आए जिनका मकसद लूट-पाट था. बहुत सारे ऐसे आए जो यहीं बस गये. सबका स्टाइल बिल्कुल पुरातन था. जिसे लूट करनी थी, उसने की और चलता बना. जिसे शासन करना था, वो पुराने स्टाइल में शासन करता रहा. सीधा हिसाब किताब था. मेरा मन किया फांसी दूंगा, मेरा मन किया छोड़ दूंगा. जनता के प्रति राजा को पितृभाव रखना चाहिए इत्यादि तरह की बातें. राजा ही कानून था और राजा ही भगवान था. चाहे वो हिंदू राजा हो या मुस्लिम राजा हो या मंगोल हो या कोई और. वहां नैतिकता-अनैतिकता का प्रश्न नहीं था. राजा का बोला हुआ ही शासन था.

ब्रिटिश राज अपने साथ लेकर आया- झूठी नैतिकता. नैतिकता का वो आवरण जिसे आनेवाले समाज ने डेमोक्रेसी के अभिन्न अंग के रूप में देखा और अभी भी देख रहा है. ब्रिटिश राज में लिखित आदेश होता था, कोई एक व्यक्ति फाइनल आदेश नहीं करता था. कई प्रक्रियाओं से होकर ये आदेश गुजरता था. अगर किसी को फांसी भी देनी है तो पुलिस, कानून, ज्यूरी, जज, पत्रकार और पब्लिक सेंटिमेंट सबका सहारा लेना होता था. होता वही था जो ब्रिटिश सरकार चाहती थी पर वो ‘चाहना’ सबके ऊपर बराबर बंटा हुआ था. पाप में सबकी भागीदारी थी.

भगत सिंह और उनके वक्त की सशस्त्र क्रांति ब्रिटिश राज की इस नैतिकता को सूट नहीं करते थे. ब्रिटिश राज खुद को वेलफेयर स्टेट यानी जनकल्याणकारी राज बनाने में जुटा था. इस चीज को समझना होगा. तैमूर या गजनवी ने यहां लूट मचाई पर लूटकर चले गये. अगर किसी देश में बैठकर बरसों तक संगठित लूट करनी है तो वहां पर एक सिस्टम बनाना होगा. तैमूर और उसके वंशज दो सौ साल तक लगातार लूट-मार नहीं मचा सकते थे. ये संभव ही नहीं था. ब्रिटिश राज तो एक हजार साल मानकर चला था. जी हां, ब्रिटिश राज दुनिया पर लगभग हजार साल के अधिकार का प्लान लेकर चला था. कम से कम ब्रिटिश अधिकारी फिलिप मैसन की किताब ‘द मेन हू रूल्ड इंडिया’ से यही जाहिर होता है. तो सिस्टम बनाना है और लूट भी करनी है तो झूठी नैतिकता का आवरण ओढ़ना ही पड़ेगा. भगत सिंह और उनके साथी इसी नैतिकता का शिकार हुए.

इसी झूठी नैतिकता के जाल में फंसे महात्मा गांधी. ए जी नूरानी ने अपनी किताब में इसका जिक्र किया है कि कैसे महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बचाने की हरसंभव कोशिश की. पर गांधी भगत सिंह को ‘कागजों’ पर नहीं बचा पाये क्योंकि इस तथाकथित वेलफेयर स्टेट के लिए हथियारबंद क्रांतिकारी खतरा थे और ब्रिटिश राज ‘अपनी पब्लिक’ के लिए ये खतरा नहीं मोल लेना चाहती थी. वो उन्हें राजनीतिक बंदी बनाने के बजाय अपराधी बताने पर तुले हुए थे. भगत सिंह ने तो इसके विरोध में अनशन भी किया था. ‘कागजी कार्रवाई’ में महात्मा गांधी के साथ हुए समझौते में ब्रिटिश सरकार ने ये तो मान लिया कि राजनीतिक बंदियों को छोड़ा जाएगा पर भगत सिंह तो राजनैतिक बंदी ही नहीं थे ब्रिटिश राज की नजर में तो कैसे छोड़ा जाए.

अपने वेलफेयर स्टेट को आगे बढ़ाते हुए ब्रिटिश राज 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट लाया और लोगों को समझाकर चुनाव भी करा लिया. 1937 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस की सरकार बनी. धीरे धीरे हमारे यहां उसी झूठी नैतिकता वाली प्रणाली बनी जिसमें कागजों पर सरकारी कार्रवाई एकदम पारदर्शी नजर आने लगी. ब्रिटिश राज को यही फायदा था. यही वजह थी कि आजादी के बाद गांधी कांग्रेस को भंग करना चाहते थे. गांधी की चाह थी कि सच्ची नैतिकता पर जनतंत्र की स्थापना हो. गांधी के आशय को दुनिया के बहुत सारे देश समझते हैं, इसलिए गांधी हमारे देश के अलावा और कहीं कहीं तो हमारे देश से ज्यादा ही विदेशों में लोकप्रिय हैं.

इसमें ध्यान देने की बात ये है कि झूठी नैतिकता गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के बजाय सब-रूल्स में ज्यादा थी. जैसे कि किसी देश के जनतांत्रिक संविधान में तो मोटा-मोटी बातें कही जाती हैं लेकिन उसका आशय निकालने और उस आशय को पूरा करने के लिए बनाये गये नियमों में जो शब्दों की हेरा-फेरी की जा सकती है, वहां पर जनतंत्र कमजोर पड़ जाता है. पिछले सत्तर-अस्सी सालों में ही दुनिया के कई देशों में जनतंत्र की स्थापना हुई और कमोबेश हर जगह जनतंत्र अपनी झूठी नैतिकता से जूझ रहा है. इसलिए आप देखेंगे कि कालांतर में फिलीपींस, रूस इत्यादि देशों में जनतंत्र की झूठी नैतिकता को उजागर करते हुए कई ‘कड़े नेता’ पटल पर आए और उन्होंने लगभग तानाशाही स्थापित कर दी है अपने देश में. क्योंकि वो हर प्रश्न के जवाब में वहां की कमजोरियां गिना देते हैं.

गांधी और भगत सिंह, दोनों ही लोग इन चीजों से वाकिफ थे.

क्या गांधी को 1921 से लेकर 1948 तक के 27 वर्षों के लिए भी एक आत्मकथा लिखनी चाहिए थी?

गांधी के राजनीतिक जीवन के आखिरी दस वर्षों को लेकर तीन बड़े आरोप लगते रहते हैं-

१. सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाना

२. सरदार बल्लभभाई पटेल की जगह जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाना

३. भारत का विभाजन

वहीं गांधी के पूरे व्यक्तिगत जीवन को लेकर तीन बड़े आरोप लगते रहते हैं-

१. कस्तूरबा और अपने बेटों के साथ व्यवहार

२. श्रीराम, गाय और जाति को लेकर उनके विचार

३. ब्रह्मचर्य और कथित यौन प्रयोग

अगर हम झूठी नैतिकता के सहारे जीना चाहते हैं तो ऐसे प्रश्न उठते ही हाय-तौबा मचाने लगेंगे. अगर हम एक ताकतवर नैतिकता के साथ जीना चाहते हैं तो इन विषयों का विश्लेषण प्रमाण और गहरी संवेदना के आधार पर करेंगे. ऐसा नहीं हो सकता कि प्रश्न उठते ही अपने अपने जजमेंट दे देंगे. चूंकि ये विषय आज के जमाने को पूरी तरह प्रभावित नहीं करते, ये हमारी उत्सुकता और भावनाओं से जुड़े विषय हैं. अगर ये आरोप सच भी साबित हो जाएं तो हमारे जीवन पर ज्यादा फर्क नहीं पड़नेवाला. अगर ये आरोप झूठे साबित हों तो भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.

पर इन आरोपों के अध्ययन से हमें एक चीज सीखने को मिलेगी. किसी भी व्यक्ति का त्वरित मूल्यांकन करने से बचने की सीख. हम अपने जनतंत्र में झूठी नैतिकता और उग्र नैतिकता के बिंदुओं को समझने में कामयाब रहेंगे. पर बिना गहरे अध्ययन के इन बातों पर बोलना सिर्फ कटुता पैदा करने जैसा है.

फिर भी अगर कोई महात्मा गांधी को लेकर अपने विचार रखना ही चाहता हो तो उसे दो भागों में बांट ले- गुड गांधी और बैड गांधी. क्योंकि अगर आप आरोपों को सही साबित करने पर तुले हैं तो निश्चित रूप से आप ‘बैड गांधी’ की इमेज देखना चाहते हैं. पर उससे मिलेगा क्या? झूठी नैतिकता की झूठी आत्मश्लाघित खुशी?

इससे बेहतर है कि हम महात्मा गांधी की आत्मकथा के उन बिंदुओं पर ही चर्चा करें जो वाकई हमारे जीवन को सही तरीके से प्रभावित कर सकते हैं. ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ एक ताकतवर फ्रेज है.

क्या गांधी को 1921 से लेकर 1948 तक के 27 वर्षों के लिए भी एक आत्मकथा लिखनी चाहिए थी? पर हमने उनको मौका ही नहीं दिया. संभवतः सवालों के जवाब मिल जाते. सत्य के साथ गांधी के प्रयोग और झूठ के साथ राजनीति के प्रयोग. इन दो पाटों के बीच महात्मा गांधी की कहानियां पिस गई हैं. अगर गांधी ‘मैं सच बोलता हूं’ की जगह ‘तुम क्यों नहीं सच बोलते’ कहते तो शायद उन पर प्रश्न खड़े नहीं होते. उन्हें इतिहास के ‘सबसे विटी लोगों’ में भी शामिल किया जाता. पर सच बोलना हमेशा खुद पर आक्रमण करवाने जैसा है. पर इस वजह से चुप भी तो नहीं रहा जा सकता.

छिछोरे: फिल्म में एक दलित कैरेक्टर रहता तो संदेश ज्यादा अच्छा होता

इंजीनियरिंग छात्रों के जीवन पर बनी फिल्म ‘छिछोरे’ एंटरटेनिंग है और असफलता से निराश ना होने का संदेश बखूबी देती है. निर्देशक नितेश तिवारी इससे पहले इसी तरह की एंटरटेनिंग और उत्साहवर्धक फिल्म दंगल बना चुके हैं.

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क्या अच्छा दिखाया है फिल्म में?

छिछोरे फिल्म में एक बच्चा आईआईटी के एंट्रेंस में फेल होने पर आत्महत्या की कोशिश कर लेता है. वो आईसीयू में भर्ती हो जाता है और उसके तलाकशुदा मां बाप अपनी अपनी स्थिति की विवेचना करते हैं. मां और बाप दोनों साथ ही इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़े हैं. यहां पर बाप को अहसास होता है कि उसने अपने बच्चे को असफल होने पर निर्णय लेने के बारे में तो सिखाया ही नहीं था. यहां पर वो याद करता है कि कैसे इंजीनियरिंग कॉलेज में उसके हॉस्टल पर लूजर होने का तमगा बरसों से लगा हुआ था. हीरो का हॉस्टल 4 हमेशा ही स्पोर्ट्स कॉम्पीटिशन में अंतिम स्थान पर आता है. जबकि हॉस्टल 3 हमेशा जीतता है. एक ही कॉलेज के कैम्पस में ये दोनों हॉस्टल बहुत अलग हैं. हॉस्टल 3 फैंसी है, वहां एलीट क्लास के बच्चे हैं और विदेशी बच्चे भी रहते हैं. लेकिन हॉस्टल 4 में देसी इंतजाम है. दारू-सुट्टा लेकर लड़के पड़े रहते हैं. हिंदी में गाली गलौज करते हैं, लेकिन ‘परिवार’ जैसा माहौल बनाकर रहते हैं. पर हीरो और उसके दोस्त मिलकर इस स्थिति को बदल देते हैं. हीरो के मुताबिक लूजर का तमगा इंसान खुद ही खुद को देता है. यही कहानी वो अपने बच्चे को सुनाता है. उसे यकीन है कि इस कहानी को सुनकर बच्चे के अंदर जिजीविषा जागेगी और उसका दिमाग का ऑपरेशन सही हो जाएगा.

फिल्म में कई अच्छी चीजें दिखाई गई हैं. मसलन हीरो और हीरोईन का तलाक तो हो चुका है, पर वो बहुत बिटर नहीं हैं. वो महसूस कर चुके हैं कि वो साथ नहीं रह सकते. इस चीज को लेकर अति भावुकता नहीं दिखाई गई है. इसके अलावा अमूमन फिल्म का हीरो ही हर चीज में जीतता है. लेकिन इस फिल्म के अंत में तीन बड़े लक्ष्य रखे गये हैं सामने. दो साइड हीरो अपने अपने लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं लेकिन हीरो ही चूक जाता है. हालांकि असफलता से ना घबराने के उद्देश्य के मद्देनजर स्क्रिप्ट में ये स्थिति बनाई गई होगी. इसे थ्री इडियट्स का आगे का वर्जन भी मान सकते हैं.

क्या समस्यायें पैदा हुई हैं फिल्म में?

पर इस समस्या का समाधान करते हुए फिल्म कई नई समस्याओं को पैदा कर देती है. सारे छात्र इंजीनियरिंग पढ़ते हैं और आश्चर्यजनक रूप से वो अपने स्पोर्ट्स की समस्या को छोड़कर बाकी किसी भी चीज से अनजान हैं. कहीं कहीं वो बहुत इन्सेंसिटिव भी हैं. जैसे जब वो अपनी क्रिकेट की टीम तैयार कर रहे होते हैं, तो वो एक लड़के को क्रिस-क्रॉस कहकर बुलाते हैं. क्रिसक्रॉस इसलिए कि उसकी आंखों में जन्मजात कोई दोष है जिसकी वजह से वो सामने नहीं देख पाता. फिर हीरो तिरछा खड़ा हो जाता है और उससे कहता है कि मुझे देख के बॉल फेंक. इसके बाद क्रिसक्रॉस हर बाल पर बस बोल्ड ही मारता है. हीरो अपनी इस ‘खोज’ पर खूब हंसता है.

इसके अलावा, हॉस्टल 4 की टीम को एक अदद गोल्ड मेडल चाहिए ताकि वो एनुअल कॉम्पीटिशन में बने रह सकें. कहीं से ये मेडल ना मिलता देख ये लोग 42 किग्रा वेटलिफ्टिंग में अपना कैंडिडेट उतारना चाहते हैं क्योंकि उसमें 42 किलो का कोई लड़का मिलता ही नहीं. एक पतले दुबले 44 किलो के लड़के डायटिंग और एक्सरसाइज कराकर ये उसे 42 किलो तक लाते हैं. पर कॉम्पीटिशन में उसका मुकाबला एक लड़की से होता है. लड़का मां शेरावाली काम नाम लेकर एरीना में पहुंचता है और उसके सारे दोस्त चिल्लाते हैं कि आज तू अपनी इज्जत बचाने के लिए खेल रहा है. लड़की से हार गया तो सारी जिंदगी तुझे लोग चिढ़ाएंगे.

इससे पहले के दृश्य में हीरो हीरोईन में बहस हो जाती है. हीरोईन कहती है कि यहां पढ़ने आए हो तो स्पोर्ट्स को लेकर इतनी टेंशन क्यों पालनी. यहां पर हीरो हीरोईन को झिड़क देता है कि तुम लोगों को तो डर के मारे पार्टिसिपेट ही नहीं करना है, तुम क्या जानोगी. ऐसे दौर में जबकि लगातार लड़कियां देश के लिए मेडल ला रही हैं, ये कहना फिल्म में फिट नहीं बैठता. हीरो अपनी इस गलती को कभी स्वीकार भी नहीं करता. यहां तक कि उसके बच्चे की आत्महत्या की कोशिश के बाद जब उसके सारे दोस्त इकट्ठा होकर उसके फ्लैट में जीवन का अनुभव शेयर कर रहे होते हैं, उसकी पत्नी ही सबके लिए खाना बना रही होती है. तलाक के बाद भी.

फिर विपक्षी टीमों को हराने के लिए हीरो उनको प्रेशर में लाने का प्लान बनाता है. और ये प्लान हूटिंग के जरिए पूरा किया जाता है. बुरी तरह से बुली करके सामनेवाले को प्रेशर में लाया जाता है. अगर ये अमेरिकन पाई जैसी कॉमेडी फिल्म होती तो ये चल जाता. लेकिन संदेश देने की कोशिश करती इस फिल्म में ये तरीका फिट नहीं बैठता. क्योंकि ये सफल तरीका आगे भी आजमाया जाएगा.

सारे दोस्तों में एक कास्ट और क्लास की हनक नजर आती है. मुख्य हीरो पाठक यानी ब्राह्मण है. यहां पर ये बात अतार्किक भी लगेगी कुछ लोगों को. पर अगर लूजर का टैग ही हटाना था तो हीरो के दोस्तों में एक दलित क्यों नहीं आ सकता? अगर ये दिखाते कि एक दलित का लड़का लूजर के टैग के बावजूद खेल में अच्छा परफॉर्म कर रहा है तो हीरो के बेटे को थोड़ी अच्छी सीख मिल जाती. क्योंकि इन लड़कों की बातों से यही लगता है कि अगर एक दलित लड़का भी होता साथ में तो उसे आरक्षण वाला कहकर मजाक बनाया जा सकता था. दलित समाज पर भी तो लूजर जैसा ही टैग लगा रखा है. आरक्षण की अवधारणा का पॉजिटिव संदेश देने का ये अच्छा मौका था. इसी तरह फिल्म में क्रिश्चियन कैरेक्टर है, पर मुस्लिम कैरेक्टर नहीं है. दोस्तों में तो आप आसानी से एक कैरेक्टर रख सकते हैं, बिना उसकी जान लेने का सीन डाले हुए. बिना तिरंगा और देशभक्ति के लिए उसके लड़ने का सीन रखे हुए. बिना पंचनमाजी हुए.

कई बार इन लोगों को देखकर लगता है कि अभी धार्मिक और अतिभावुकता की राष्ट्रवादी नारेबाजी की जाए तो ये सारे लड़के करने लगेंगे. ये बस जीतना जानते हैं और जीत के लिए कोशिश करना. जीतना ही सब कुछ है. पर इस सब कुछ के केंद्र में व्यक्ति खुद है, समाज का कोई और हिस्सा नहीं.

प्रेमचंद और रागदरबारी छोड़ दें तो किसी हिंदी साहित्य से मिलेनियल लगाव नहीं रखते

हिंदी साहित्य के कितने लेखकों के नाम जनता आसानी से गिना सकती है? मोटे तौर पर ये रहे कुछ लेखक-

निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, प्रेमचंद, कमलेश्वर, अमरकांत, मोहन राकेश, सुरेंद्रनाथ वर्मा, अलका सरावगी, कृष्णा सोबती, ममता कालिया, राजेंद्र यादव, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, हजारी प्रसाद द्विवेदी, भगवतीचरण वर्मा, राजकमल चौधरी, राही मासूम रजा, अज्ञेय, रेणु, शरद जोशी, परसाईं, देवकी नंदन खत्री, जयशंकर प्रसाद, भीष्म साहनी, अमृतलाल नागर, विनोद कुमार शुक्ल, शिवपूजन सहाय, पुरुषोत्तम अग्रवाल, काशीनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कृष्ण चंदर, विष्णु प्रभाकर, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, जैनेन्द्र कुमार, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, मृदुला गर्ग, शिवानी, वृंदावन लाल वर्मा, नरेंद्र कोहली इत्यादि.

आज भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल की उम्र के नीचे है. यूपी, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे हिंदीभाषी प्रदेशों में ये युवा आबादी बड़ी मात्रा में हैं. उपरोक्त साहित्यकारों में से प्रेमचंद की रचनाओं और श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘रागदरबारी’ को छोड़ दें तो मिलेनियल और किसी साहित्यकार के उपन्यास से इत्तेफाक नहीं रखते. इसमें ना तो लेखकों का दोष है, ना ही मिलेनियल्स का. सारे लेखकों की रचनायें अपने वक्त में काफी पॉपुलर रही हैं. पर अभी के वक्त में उनसे जुड़ाव रख पाना मुश्किल है. आप श्रद्धा सुमन के तौर पर पढ़ सकते हैं, लेकिन जीवन के झंझावात से जूझता मिलेनियल शायद ही पढ़े.

पर यहां एक आश्चर्यजनक चीज देखने को मिलती है. यही मिलेनियल जौन एलिया, फैज, मीर, गालिब, दुष्यंत कुमार, पाश की रचनाओं पर लहालोट होते रहते हैं. आपको ऐसे बहुत लड़के मिल जाएंगे जो एक दूसरे को सलाह देते रहते हैं कि जौन एलिया को ज्यादा मत पढ़ना, जिंदगी खराब हो जाएगी.

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इसके पीछे कई वजहें हैं

एक वजह है भाषाई दिक्कत. प्रेमचंद, कृष्ण चंदर इत्यादि को छोड़ दें तो ज्यादातर लेखकों ने शुद्ध हिंदी की तरफ ही रुख किया है. इससे लेखन में बनावटीपन आ जाता है. शायरी फिर भी हिंदुस्तानी भाषा में लिखी हुई है. यहां मैं उस शायरी की बात नहीं कर रहा, जो हाफिजों को भी समझ ना आए. दूसरी वजह है, विषयों से जुड़ाव ना होना. शायरी के विषय तमाम हैं, हर व्यक्ति को अपने लायक चीजें मिल जाती हैं. पर हिंदी लेखकों के विषय आज के मुद्दों से टकराते ही नहीं हैं.

यहां एक समस्या है. अगर किसी पुरानी रचना को लेकर उसका विश्लेषण किया जाए तो उस पर बैकलैश होने की संभावना ज्यादा है. फिर भी एक कोशिश करते हैं. धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ में एक कृत्रिम रोमांस दिखाया गया है. एक वक्त ये उपन्यास युवाओं में बहुत पॉपुलर था, पर अभी लिव-इन और टिंडर के जमाने में ये उपन्यास बेमानी लगता है. सुरेंद्रनाथ वर्मा का उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ एक विद्रोही लड़की की कहानी है, पर आज की लड़कियों के लिए वो जिंदगी विद्रोह नहीं है, नॉर्मल है. हां, पिता से जरूर डर सकती हैं, पर खुल के जीने में उन्हें कोई संकोच नहीं है.

उसी तरह अगर कमलेश्वर के उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को लें तो ये बहुत बोरिंग है. इसमें बहुत सारे मुद्दों को उठाया गया है, फिर भी लगता है कि कोई मुद्दा नहीं उठाया गया है. कहीं कुछ दिखाया नहीं गया है, इसमें सब कुछ बताया गया है. और आज के युवा ‘ज्ञान बांटने’ को सबसे बड़ा पाप मानते हैं. हां, काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ जरूर फेमस हुआ क्योंकि बुड्ढों की कहानी कही गई है, पर मिलेनियल अंदाज में. बनारस से नॉस्टैल्जिक होने के पीछे ये वजह भी है कि वहां की कहानियों में एक उच्छृंखलता मिलती है. यही आज के युवा का गुण है.

विषयों का चुनाव भी महत्वपूर्ण है

अगर दक्षिण भारतीय भाषाओं के लेखकों की बात करें तो विलास सारंग, यू आर अनंतमूर्ति, विवेक शानबाग, भैरप्पा, पेरुमल मुरुगन इत्यादि की रचनाएं अभी के वक्त से जुड़ती जाती हैं. उनका लिखा बहुत कनेक्ट करता है. अगर बुकर प्राइज के लिए जानेवाली किताबों के विषय देखें तो वो पर्यावरण, सेक्सुअल हैरेसमेंट, दुनिया का कन्फ्यूजन, पॉलिटिक्स, मल्टिपल रिलेशनशिप सारी चीजों को समेट के चल रही हैं.

अगर हिंदी साहित्य के उपन्यासों के विषयों को उठाकर देखें तो पुराने और नये सबमें एक ही तरह के विषय हैं. ज्यादातर हिंदी साहित्य को पढ़कर लगता है कि लेखक पहला ड्राफ्ट पापा को दिखाता है. उसी हिसाब से विषय और शब्द चुने जाते हैं.

नये लेखकों की पुराने लेखकों से तुलना करना बेकार है

कहने का मतलब ये नहीं है कि उपरोक्त लेखकों के उपन्यास बेकार हैं या पढ़ने लायक नहीं हैं. अच्छे हैं पर कनेक्ट नहीं कर पा रहे. वहीं अंग्रेजी के लेखक चेतन भगत, अमीश त्रिपाठी, देवदत्त पटनायक इत्यादि की हिंदी में अनूदित किताबें भी बिक रही हैं. युवा इन्हें खूब पढ़ रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा है? सीधी बात है, इन लेखकों की कहानियां युवाओं से कनेक्ट करती हैं.

हिंदयुग्म से आए नये लेखक सत्या व्यास, नीलोत्पल मृणाल, दिव्यप्रकाश दुबे, शशांक इत्यादि की किताबों ने मार्केट में जगह बनाई हैं. हाल-फिलहाल में ये किताबें युवाओं में पॉपुलर हुई हैं. हालांकि इनकी आलोचना भी बहुत हुई है. ये बात सही है कि पुराने साहित्यकारों से नये लेखकों के उपन्यासों की तुलना नहीं की जा सकती. लेकिन जरूरत क्या है तुलना करने की? ऐसे तो तुलना करें तो बिहारी और तुलसीदास की तुलना में हिंदी के पुराने लेखकों की रचनाएं कुछ भी नहीं हैं. वेदव्यास के महाभारत की तुलना में बिहारी और तुलसीदास कहीं नहीं ठहरते. ये तुलना ही बेमानी है.

नये लेखक ही पुराने लेखकों के प्रति रूझान पैदा कर पाएंगे

इसमें एक और बात है. ऐसा नहीं है कि पुराने लेखकों का साहित्य अब कभी काम ही नहीं आएगा. दिक्कत उनकी नहीं है. दिक्कत आज के लेखकों की है. आज के ज्यादातर लेखक अगर युवाओं से जुड़ी चीजों पर लिखें तो साहित्य के प्रति रूझान बनेगा. आज के ज्यादातर लेखक भी पुराने लेखकों की तरह लिखते हैं. ये मुख्य समस्या है.

साहित्य का युग बनता है. मिलेनियल्स के लिए अभी साहित्य का युग बना ही नहीं है. जब इंसान अपने युग की रचनायें पढ़कर आश्वस्त हो जाता है कि यहां से सारे उत्तर नहीं मिलेंगे तो वो फिर पुराने लेखकों की तरफ जाता है. उस वक्त वो लेखक भगवान के भेजे दूत लगते हैं.

ये बिल्कुल वैसा ही है कि आज हम न्यूटन की तरह बाग में सेब के गिरने का इंतजार नहीं कर सकते. हम लैपटॉप लेकर ही अपना काम शुरू करेंगे. यहां से विज्ञान पढ़ते पढ़ते हम न्यूटन के बारे में इंटरेस्टेड हो सकते हैं और उनका लिखा पढ़ सकते हैं. नियमों के अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा है.

तो जिम्मेदारी आज के लेखकों की है कि वो ऐसा माहौल बनायें जिससे साहित्य के प्रति युवाओं का रुझान बढ़े और पुराने लेखकों की रचनायें यश-अपयश के भय से मुक्त होकर बुकशेल्फ में विराजें.

 

कीशॉट: विषय और स्टाइल की वजह से बुकर की सबसे बड़ी दावेदार

सलमान रूश्दी का नया उपन्यास ‘कीशॉट’ बुकर 2019 की आखिरी छह किताबों की लिस्ट में है. लगभग 25 साल बाद सलमान रूश्दी का कोई उपन्यास बुकर की इस लिस्ट में पहुंचा है. इससे पहले 1981 में आया उनका उपन्यास द मिडनाइट्स चिल्ड्रन बुकर जीत चुका है. उस उपन्यास को 1993 में बुकर ऑफ द बुकर और 2008 में बेस्ट ऑफ द बुकर का प्राइज भी मिल चुका है. आखिरी बार 1994 में उनका उपन्यास द मूर्स लास्ट साई बुकर के लिए नामांकित हुआ था.

तब से अब तक के पच्चीस सालों में रूश्दी के कई उपन्यास आए. 2017 में द गोल्डन हाउस और 2012 में आत्मकथात्मक जोसेफ एंटन नाम की नॉन फिक्शन किताबें आईं जो चर्चा में रहीं. लेकिन इनकी बुराई ज्यादा हुई. कहा गया कि 1981 वाला रूश्दी चुक गया है. हालांकि ‘कीशॉट’ के लिए भी न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि ये किताब सलमान रूश्दी के तेवरों की याद नहीं दिलाती.

पर मेरी नजर में ऐसा नहीं है. बहत्तर साल की उम्र में सलमान रूश्दी ने एक बार फिर शानदार उपन्यास रचा है. हां, मिडनाइट्स चिल्ड्रन या द सैटनिक वर्सेज जैसा हंगामा नहीं खड़ा कर सकती ये किताब, पर ये भी तो देखिए कि जमाना कितना बदल गया है. ये भी देखिए कि सलमान रूश्दी की मौलिकता बरकरार है. अपने पहले फेमस उपन्यास से लेकर सलमान रूश्दी ने बिल्कुल मौलिक लेखन किया है, वही उनकी ताकत है. किसी कविता या संगीत की तरह उनका लेखन फ्लो कर रहा है.

“BE A LAWYER in a lawless time was like being a clown among the humorless_ which was to say, either completely redundant or absolutely essential.”

कीशॉट नाम सर्वैंटीज के उपन्यास डॉन कीजॉट से लिया गया है. कीजॉट भी एक फ्रेंच ओपेरा से उठाया गया था जिसका नाम कीशॉट ही था. सलमान रूश्दी अपनी किताबों में तमाम लिटरेरी रेफरेंस देने के लिए जाने जाते हैं. यही नहीं, इनकी लेखनी में भारतीय और अरब मिथकों के भी खूबसूरत और अचंभा पैदा करनेवाले रेफरेंस मिलते हैं.

पर कीशॉट की कहानी या सारांश बतायें भी तो कैसे बतायें? आज की दुनिया में क्या चल रहा है, उसका सारांश हम क्या बता सकते हैं? मोटा मोटी बस ये समझ लीजिए कि आज की दुनिया में गल्प और तथ्य में फर्क करना मुश्किल हो गया है. और तथ्य होता क्या है? हजार झूठ की सवारी कर के ही तो सच आता है. हजार सच से ही तो झूठ निकलता है. सच तो यही था कि महात्मा गांधी की हत्या हुई. मरते वक्त उन्होंने क्या कहा था? क्या सच था और क्या झूठ? और उस सच या झूठ से क्या निकला? सच या झूठ? बच क्या गया? गांधी से प्रेम या गांधी से नफरत? यही सारांश है सलमान रूश्दी के उपन्यास कीशॉट का.

उपन्यास कीशॉट में कहानी के अंदर कहानी चलती है. जैसे क्रिस्टोफर नोलान की फिल्म इंसेप्शन में सपने के अंदर सपना चलता है. सलमान रूश्दी का नायक एक असफल जासूसी लेखक है सैम. उसके उपन्यास का नायक है इस्माइल इस्माइल. ये नाम तो मोबी डिक उपन्यास के नायक इस्माइल से उठाया गया है. कॉल मी इस्माइल. इस्माइल का एक काल्पनिक बेटा है सैंको पांजा. जैसे डॉन कीजॉट का साथी होता है सैंको पांजा. पर कीशॉट में पांजा काल्पनिक कैरेक्टर है. इस्माइल कल्पना में ही जीता है और इतनी टीवी देखता है कि उसे असली जिंदगी और टीवी की जिंदगी में फर्क ही नहीं पता है. इस्माइल को ओपरा विन्फ्रे की तरह प्रोग्राम करनेवाली टीवी होस्ट सलमा आर से प्रेम हो जाता है और वो उससे शादी करने की ठान लेता है.

सलमान रूश्दी ही अपने उपन्यास की नायिका का नाम खुद के नाम पर सलमा आर रख सकते हैं. हां, कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है, लेखक सैम और उसके नायक इस्माइल की जिंदगियां आपस में टकराती हैं. जो चीज इस्माइल की जिंदगी में हो रही है, वही सैम की जिंदगी में हो रही है. फैक्ट और फिक्शन में अंतर ना कर पाना. अमेरिका की यात्रा करते हुए इस्माइल अपने परिवार के इमोशनल कन्फ्लिक्ट को सुधारता है. वहीं सैम भी अपनी भावनात्मक चीजों का सामना करता है. पर रूश्दी का उपन्यास इस बारे में है ही नहीं.

यहां से सलमान रूश्दी ने डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिका, एलन मस्क के ऑब्सेशन, पब कल्चर, सोशल मीडिया का पागलपन सब कुछ लपेट लिया है. ऐसा लगता है कि हम किसी वर्ल्ड टूर पर निकले हैं और पूरी दुनिया में फैले कन्फ्यूजन को देख रहे हैं. ये दुनिया ऐसी हो गई है कि यहां कुछ भी हो सकता है. कोई आजादी की तलाश में पूरे शरीर पर टैटू बना रहा है, कोई चारोें ओर नथुनी पहन रहा है, कोई आत्महत्या कर रहा है. कोई गांजा फूंक रहा है, कोई दौड़े चला जा रहा है. सलमान रूश्दी ने इस कहानी में यूक्रेन के कॉमेडियन से प्रेसिडेंट बननेवाली घटना को भी शामिल किया है. जाहिर सी बात है, अगर वो हैं, तो भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जिक्र के बिना उपन्यास पूरा नहीं होगा. यही नहीं, इसमें मैजिकल रियलिज्म अलग से भी है. एक टिड्डा है जो बोलता है. एक खतरनाक दवाई है जो सिर्फ अमीर लोगों के काम आती है. एक अमेरिकी मिथकों का जानवर है जो उद्मियों को निरूपित करता है.

सलमान रूश्दी ही वो लेखक हो सकते हैं जो आज भी मुंबई को बंबई बुला सकते हैं. बंबई रूश्दी की यादों से कहीं गया नहीं है. बंबई, लंदन और अब अमेरिका. अमेरिका का कोई शहर नहीं, पूरा अमेरिका अब उनका शहर है. इन्हीं तीनों में उनकी कहानी घूमती है. पहले वो लंदन और बंबई को लेकर लिखते थे. पर अब उनके लेखन में सबसे ऊपर अमेरिका रहता है.

ज्ञात हो कि उनके उपन्यास द मिडनाइट्स चिल्ड्रन में नायक सलीम सिनाई भारत की आजादी के रात उसी सेकेंड पर पैदा होता है, जिस सेकेंड आजादी मिलती है. सलमान रूश्दी और उनके दौर के लोग भी मिडनाइट चिल्ड्रन ही हैं. उस उपन्यास में तत्कालीन भारत की एब्सर्डिटी देखने को मिलती है. फिर द सैटनिक वर्सेज में एब्सर्डिटी का एक अलग स्तर देखने को मिला. कीशॉट में तो लगता है कि अब दुनिया में कुछ बचा ही नहीं है.

लेकिन रूश्दी एक चीज पर दांव लगाते हैं. सब कुछ लुट जाने की स्थिति में भी एक चीज बची हुई है- प्रेम. यही उनके उपन्यास का आधार है. पागलपन से भरी आज की दुनिया में संभवतः प्रेम ही बचा सकता है.

सलमान रूश्दी के सारे उपन्यास पढ़ने लायक हैं. बंबई से दूर रहकर भी बंबई को जिस तरीके से वो अपने उपन्यासों में ला देते हैं, वैसा तो कोई बंबई में रहनेवाला भी नहीं ला सकता. उनका हर उपन्यास अपने वक्त की हवा में बह रही खतरनाक आवाजों को कैप्चर करता है. भविष्य में ये उपन्यास आज की कहानी कहेंगे. चाहे इंटरनेट पर कितना ही फेक न्यूज और तमाशा फैला रहे, आनेवाली पीढ़ियां सलमान रूश्दी के उपन्यास पढ़ेंगी तो आज के वक्त का अंदाजा लगा लेंगी.